*।।ईश्वर-प्राप्ति जीवन का उद्देश्य।।*
*।श्री माँ की अमृतवाणी।*
पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा
*२९. यदि तुम भगवान का स्मरण नहीं करते हो – सचमुच काफी लोग ईश्वर को मानते ही नहीं – तो इससे उनका क्या? यह तो तुम्हारा ही दुर्भाग्य है। भगवान की माया ही ऐसी है कि वे सब को इसी प्रकार भुलाए रखते हैं और कहते हैं, _‘वे सुखी हैं न, उन्हें वैसे ही रहने दो!’_*
*२९. यदि तुम भगवान का स्मरण नहीं करते हो – सचमुच काफी लोग ईश्वर को मानते ही नहीं – तो इससे उनका क्या? यह तो तुम्हारा ही दुर्भाग्य है। भगवान की माया ही ऐसी है कि वे सब को इसी प्रकार भुलाए रखते हैं और कहते हैं, _‘वे सुखी हैं न, उन्हें वैसे ही रहने दो!’_*
जय जय माँ,जय माँ।
*।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*