ईश्वर-प्राप्ति जीवन का उद्देश्य II पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा II *।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*

*।।ईश्वर-प्राप्ति जीवन का उद्देश्य।।*

 *।श्री माँ की अमृतवाणी।*

पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा
*२९. यदि तुम भगवान का स्मरण नहीं करते हो – सचमुच काफी लोग ईश्वर को मानते ही नहीं – तो इससे उनका क्या? यह तो तुम्हारा ही दुर्भाग्य है। भगवान की माया ही ऐसी है कि वे सब को इसी प्रकार भुलाए रखते हैं और कहते हैं, _‘वे सुखी हैं न, उन्हें वैसे ही रहने दो!’_*

जय जय माँ,जय माँ।

*।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*

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