पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा II *।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*

।श्री माँ की अमृतवाणी।*

पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा
*२७. 
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  1. साधना में, कथनी और करनी में सच्चे रहो। 
  2. तुम धन्य हो जाओगे!उनका आशिर्वाद जगत के सभी प्राणियों पर सदैव बरस रहा है। 
  3. उसके लिए निवेदन करने की आवश्यकता नहीं। 
  4. सच्चे मन से ध्यान करो। 
  5. तब तुम्हें उनकी असीम कृपा का बोध होगा। 
  6. ईश्वर चाहते हैं सरलता-निष्कपटता, सच्चाई और प्रेम। 
  7. केवल भावपूर्ण शब्दों की झड़ी से उन्हें प्रसन्न नहीं किया जा सकता।*
जय जय माँ,जय माँ।
*।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*

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