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| पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा |
*।श्री माँ कीअमृतवाणी।*
पुरुषार्थ एवं दैवीकृपा
*३४. शिष्य:-* _जो भगवानके ऊपर निर्भरकरके पड़े रहतेहैं पर साधनानहीं करते, क्याउन्हें ईश्वर की अनुभूतिहोगी?_
*श्रीमाँ :- वे पूर्णतयाईश्वर की शरणमें जाते हैं, उन पर पूर्णविश्वास रखकर जीवनयापनकरते हैं– यहीउनकी साधना है।नरेन्द्र ने कहाथा, _‘होने दोमेरे लाखों जन्म, मुझे भय नहीं।’_ ज्ञानी को पुनर्जन्मका डर कहाँ? उनमें तो कोईपाप नहीं होता।अज्ञानी मनुष्य ही भयसे डरते हैं।वे ही संसार–बन्धन में फँसजाते हैं। वेही बद्ध होकरपाप में लिप्तहोते हैं। लाखोंजन्म भोगकर, कष्टपाकर अन्त मेंउन्हें ईश्वर को पानेकी इच्छा होतीहै। … गाय काबछड़ा ‘हम्बा, हम्बा’ (मैं हूँ, मैंहूँ) करता है।उसकी खाल औरअंतड़ियों से जबढोल एवं अन्यवाद्य बनाते हैं, तब भी उसकीवही आवाज निकलतीहै। अन्त मेंवह धुनिया केहाथ में जाताहै और तभी‘तूँहूँ, तूँहूँ’ (तुम्हीं हो, तुम्हीं हो) कहताहै।*
जय जय माँ,जय माँ।
