*।श्री माँ की अमृतवाणी।*
पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा
*३३. हृदय के अन्तःस्थल से भगवन्नाम का जप करो और शुद्ध हृदय से ठाकुर के शरण में जाओ। आसपास की चीजों से तुम्हारे मन में क्या विचार आते हैं, इसके बारे में चिन्ता मत करो। आध्यात्मिक पथ में तुम प्रगति कर रहे हो या नहीं, इसके सम्बन्ध में भी हिसाब लगाने में और चिन्ता करने में समय मत गँवाओ। स्वयं की प्रगति के बारे में निर्णय करना अहंकार की निशानी है। गुरू एवं इष्ट की कृपा प़र विश्वास रखो।*
*३३. हृदय के अन्तःस्थल से भगवन्नाम का जप करो और शुद्ध हृदय से ठाकुर के शरण में जाओ। आसपास की चीजों से तुम्हारे मन में क्या विचार आते हैं, इसके बारे में चिन्ता मत करो। आध्यात्मिक पथ में तुम प्रगति कर रहे हो या नहीं, इसके सम्बन्ध में भी हिसाब लगाने में और चिन्ता करने में समय मत गँवाओ। स्वयं की प्रगति के बारे में निर्णय करना अहंकार की निशानी है। गुरू एवं इष्ट की कृपा प़र विश्वास रखो।*
जय जय माँ,जय माँ।
*।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*
*।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*