।।श्रीरामकृष्ण वचनामृत।।
(भाग १–पेज–६१६ता.१९.९.१८८४)
……… योगभ्रष्ट …….
_महेन्द्र मुखर्जी:- इसके बादउपाय?_
*श्रीरामकृष्ण :-“कामना के रहते, भोग की लालसाके रहते, मुक्तिनहीं होती। इसलिएखाना–पहनना, रमणकरना, यह सबकर लेना। (सहास्य) तुम क्या कहतेहो? स्वकीया केसाथ या परकीयाके साथ?”*
_मास्टर, मुखर्जी, ये लोगहँस रहे हैं।_ ……(क्रमशः)…..
जय जय रामकृष्ण।
*।।ईश्वर–प्राप्ति जीवन काउद्देश्य।।*