।श्री माँ की अमृतवाणी।*
पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा
*३८. बेटा, यदि मेरे आशिर्वाद से तुम्हें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति होता हो, तो मैं अपने सम्पूर्ण मन–प्राण से आशीर्वाद देती हूँ। माया के चंगुल से छुटकारा पाना क्या किसी मनुष्य के लिए सम्भव है, जब तक उसे किसी की सहायता न मिले? इसलिए ठाकुर ने इतनी कठोर साधनाएँ की और उनका फल मानवता के कल्याण के लिए अर्पित कर दिया।*
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पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा
*३८. बेटा, यदि मेरे आशिर्वाद से तुम्हें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति होता हो, तो मैं अपने सम्पूर्ण मन–प्राण से आशीर्वाद देती हूँ। माया के चंगुल से छुटकारा पाना क्या किसी मनुष्य के लिए सम्भव है, जब तक उसे किसी की सहायता न मिले? इसलिए ठाकुर ने इतनी कठोर साधनाएँ की और उनका फल मानवता के कल्याण के लिए अर्पित कर दिया।*
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जय जय माँ,जय माँ।
*।जपात् सिद्धि–श्रीमाँ।*