नर्मदा जयन्ती विशेष मे- माँ नर्मदा की जन्म-कथा- II त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे

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नर्मदा जयन्ती विशेष मे-
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दिनांक 3 फरवरी 2017 को है।
माँ नर्मदा की जन्म-कथा-
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एक समय पृथ्वी लोक में पापों की वृद्धि हुई पाप इतना बड़ा की प्रकृति ने रुष्ट हो कर अपने नियम ही बदल लिए। जिसके फलस्वरुप भयंकर सूखा अकाल पढ़ा लोग खाने और पानी की एक एक बूंद के लिए तरसने लगे भीषण गर्मी कई वर्षों तक वर्षा ऋतु आई ही नहीं। तब सारे ऋषि मुनियों और सारे भक्त मिलकर त्राहिमाम त्राहिमाम शिव शंकर  त्राहिमाम करने लगे। वहां कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर ध्यान मग्न विराजमान थे जब सारे ऋषि-मुनि और भक्तों की पुकार कैलाश पर्वत पर पहुंची तो भगवान शिव का आसन डोलने लगा। भगवान शंकर ने ध्यान मुद्रा तोड़ी और पृथ्वी लोक की तरफ दिव्य नेत्रों से देखा तो प्राणियों की यह दुर्दशा देखकर उन्हें क्रोध आ गया और फिर वह क्रोधवश भयंकर तांडव करने लगे। यह तांडव 3 दिन तक चला फिर सारे शिवगण और माता सती ने प्रार्थना की तो भगवान शिवशंकर शांत हुए। जब भगवान अपने आसन पर बैठे तो उनके पूरे शरीर से पसीना बह रहा था भगवान शंकर ने अपने हाथों की उंगलियों से अपने माथे का पसीना पोंचा और उस पसीने को जमीन पर छिड़का उस पसीने की बूंदों से एक 12 वर्षीय कन्या प्रकट हुईl

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तब प्रभु बोले- हे देवी आपका जन्म सारी मानवता के कल्याण के लिए हुआ है पृथ्वी लोक में पाप अनाचार बढ़ने से अकाल पड़ा हुआ है आप पापो की नाशनी होंगीं।
जो भी प्राणी श्रद्धा सहित आप को नमन करते हुए आपके दर्शन करेगा तो सिर्फ दर्शन मात्र से ही उसके सारे पापों का नाश होगा और अनंत काल में आपके अनन्य भक्त होंगे। आपका नाम नर्म अर्थात सुखदा अर्थात देने वाली

                      ।। नर्मदा होगा।
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   तब मां नर्मदा ने हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया और बोली -प्रभु आपने कहा मेरे अनन्य भक्त होंगे तो मैं अपने भक्तों के लिए आपसे कुछ वरदान मांगना चाहती हूं।
भगवान शिव बोले- मांगो देवी।
तब मां नर्मदा ने वरदान मांगे-

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     प्रलय में भी मेरा नाश न हो।
मेरा हर पाषाण (नर्मदेश्वर) शिवलिंग के
   रूप में बिना प्राण-प्रतिष्ठा के पूजित हो।
मेरे (नर्मदा) तट पर शिव-पार्वती सहित
          सभी देवता निवास करें।
      मेरे भक्तों को सर्व प्रकार के
                 सुख प्राप्त हो।
मेरे भक्तों को यमराज के दरबार में खड़ा होना ना पड़े।
भगवान शंकर मुस्कुराए और हाथ उठाकर बोले –
                        “तथास्तु”


फिर भगवान शिव की आज्ञा से नर्मदा जी मगरमच्छ के आसन पर विराज कर उदयाचल पर्वत पर उतरीं और पश्चिम दिशा की ओर बहकर गईं। और फिर मां नर्मदा की कृपा से मानव सभ्यता फली फूली सुख देने वाली मां नर्मदा सभी को अपनी कृपा का सुख अभी तक दे रही हैं।
नमामी देवी नर्मदे ।
मेकल कन्या विद्महे, रूद्रतनया धिमहि
            तन्नो रेवा प्रचोदयात्
      

    ।।त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे।।
           ✍🍀💕

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