मनुष्य की बुद्धि कितनी है ? चाहेगा कुछ, और माँगेगा कुछ ! अन्त में शिव बनाते-बनाते बन्दर बना बैठेगा ।

p { margin-bottom: 0.25cm; line-height: 120%; }

                                                             सुप्रभातम्                                                      🌼    माँ की वाणी    🌼

🍀   मनुष्य की बुद्धि कितनी है ? चाहेगा कुछ, और माँगेगा कुछ ! अन्त में शिव बनातेबनाते बन्दर बना बैठेगा । इसीलिए उनके शरणागत होकर रहना ही ठीक है । जब जिसे जो चाहिए, वे उसे देंगे । फिर भी भक्ति और निर्वासना की कामना करनी चाहिए यह कामना कामना में नहीं आती ।

                                                    🌸    संयम और सिद्धि    🌸

🍀    मिस्र देश के जून्नून नामक एक महात्मा हो गये हैं । उनके पास प्रसिद्ध मुसलमान सन्त यूसुफ हुसैन धर्म की दीक्षा लेने गये । तब महात्मा जून्नून ने उन्हें एक छोटा सा बक्स देते हुए कहा — “मेरा एक मित्र यहाँ से दूर नील नदी के किनारे रहता है; इस बक्स को बड़ी सावधानी से ले जाकर दे आओ, तब आकर दीक्षा लेना ।
           रास्ते में यूसुफ हुसैन ने सोचा कि जब बक्स में ताला नहीं है, तो इसे खोलकर देखा जाय और कौतूहलवश उन्होंने बक्स का ढक्कन खोला, तो उसमें से एक चूहा निकलकर भागा । उस बक्स में चूहे के अतिरिक्त और कुछ न था ।
           अब यूसुफ हुसैन को बड़ा ही पछतावा हुआ कि उन्होंने व्यर्थ ही ढक्कन खोला, किन्तु अब पछताने से कोई लाभ न था, आखिर उन्होंने वह खाली बक्स ही महात्मा जून्नून के सन्त मित्र को दिया  । बक्स खोलने पर जब उस सन्त मित्र को उसमें कुछ भी न दिखाई दिया, तो वे बोले, “महात्मा जून्नून तुम्हें दीक्षा नहीं देंगे, क्यों कि तुममें संयम नहीं है । उन्होंने इस बक्स में जरूर कुछ न कुछ भेजा होगा । सचसच बताओ इसमें उन्होंने कौनसी वस्तू भेजी थी ?” यूसुफ ने सहीसही बात बताकर उनसे माँफी माँगी । उन सन्त मित्र ने महात्मा जून्नून से माफी माँगने के लिए कहा ।
               हताश यूसुफ महात्मा जून्नून के पास लौट आये और उन्होंने सारा वृत्तान्त बताकर उनसे क्षमा माँगी । जून्नून बोले, “यूसुफ, अभी तुम परम ज्ञान के अधिकारी नहीं हो । मैंने तुम्हें एक चूहा सौंपा था, जिसे तुमने गँवा दिया । तब भला धर्मज्ञान जैसी अमूल्य निधि को तुम कैसे सुरक्षित रख पाओगे ? उसके लिए तुम्हें अतीव संयम की जरूरत है । जाओ, अपने चित्त को वश में करने का अभ्यास करो और पुनः आओ, क्यों कि संयम के बिना सिद्धि दुर्लभ है ।
            यूसुफ हुसैन अपने निवासस्थान को वापस लौटे और आत्मसंयम का अभ्यास करने लगे । कई वर्षों के पश्चात् वे पूर्ण विश्वास के साथ पुनः महात्मा जून्नून के पास गये और इस बार उनका मनोरथ सफल हुआ ।

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started