राजा मानसिंह द्ववारा गोविन्ददेके मन्दिर का निर्माण*
रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के शिष्य द्वारा बनवाया गोविन्ददेव का मन्दिर बहुत दिन बाद जीर्ण–शीर्ण हो गया। तब सन् 1590 में राजा मानसिंह ने बहुत अर्थ व्यय कर वर्तमान लाला पत्थर के विशाल मन्दिर का निर्माण किया, जिसे उत्तर भारत का सबसे आकर्षक और हिन्दू स्थापत्य का अतुलनीय दृष्टांत माना जाता है।
इस मन्दिर का निर्माण करने का जब मानसिंह ने विचार किया, उस समय अकबर बादशाह पूर्वी राजस्थान के लाल पत्थर से आगरे के क़िले का निर्माण करवा रहे थे। इस लाल पत्थर को प्राप्त करने का और किसी को अधिकार नहीं था। पर मानसिंह उस समय अकबर के सेनापति थे, और उनके बड़े विश्वासपात्र थे। मानसिंह के अनुरोध पर उन्होंने गोविन्ददेव के मन्दिर के लिए बिना मूल्य इस पत्थर को देने की अनुमति दे दी। एक सौ तीस बीधा ज़मीन भी मन्दिर की सेवा के लिए भेंट कर दी।
मानसिंह की मृत्यु (सन् 1614) के बाद सौ वर्ष से भी अधिक यह मन्दिर अपने पूरे गौरव–गरिमा के साथ भक्तों और तीर्थ–यात्रियों के आकर्षण का प्रधान केन्द्र बना रहा। पर हिन्दू–विद्रोही बादशाह औरंगजेब के नेत्रों में इसका खटकना स्वाभाविक था। उसके द्वारा मन्दिर को नष्ट किये जाने के भय से गोविन्ददेव को पहले आमेर की घाटी में एक मन्दिर बनवाकर उसमें विराजमान किया गया। जब महाराज जयसिंह ने जयपुर बसाया, तब पहले जयनिवास में मन्दिर बनवाकर उसमें गोविन्दजी को ले जाया गया। उसके सामने चन्द्रमहल का निर्माण इस प्रकार किया कि राज महल से गोविन्ददेव के दर्शन कर सकें। राजा वैष्णव थे। वे गोविन्द देव को ही रियासत का राजा मानते और स्वयं उनके दीवान की हैसियत से राजकार्य चलाते। रियासत की मोहर पर लिखा होता “महाराजाधिराज श्रीश्रीगोविन्ददेवजी, दीवान महाराजा जयसिंह।” आज भी गोविन्ददेव उसी मन्दिर में विराजमान हैं। महाप्रभु के गौरगोविन्द विग्रह भी उनके दाहिने पार्श्व में उसी सिंहासन पर विराजमान हैं।
वृन्दावन के मन्दिर का प्रधान चूड़ा इतना ऊँचा था कि उसके आलोक मंच से विच्छुरित आलोकराशि आगरा से देखी जा सकती थी। जब औरंगजेब को पता चला कि यह आलोकराशि हिन्दुओं के इस मन्दिर की है, तो उसने एक फ़ौजदार को भेजकर उसके मूल मन्दिर और उससे संलग्न पांच चूड़ा ध्वंस करवा दिये। फ़ौजदार के वृन्दावन आने के पूर्व ही गोविन्ददेव के विग्रह औ अन्य प्रधान–प्रधान विग्रहों को जयपुर पहुँचा दिया गया था। दिल्ली के बादशाह मोहम्मद शाह के राजत्वकाल (1729-48) में किसी समय वृन्दावनवासी भक्तों ने गोविन्दजी की एक प्रतिमूर्ति पधरा दी। सन् 1819 में नन्दकुमार बसू नामक एक भक्त ने मानसिंह के मन्दिर के उत्तर पश्चिम में एक नया मन्दिर बनवाकर उस मूर्ति को वहाँ स्थापित किया। आज भी गोविन्ददेव वहीं विराजमान हैं।