"মায়া বই কি! মায়া না হলে আমার এ দশা কেন? আমি বৈকুণ্ঠে নারায়ণের পাশে লক্ষ্মী হয়ে থাকতুম। ভগবান নরলীলা করতে ভালবাসেন কিনা!"*

*- :      শ্রী শ্রী মায়ের জীবনকথা      : -*

*”ওঁ যথাগ্নের্দাহিকা শক্তিঃ রামকৃষ্ণে স্থিতা হি যা।*
*সর্ববিদ্যাস্বরূপাং তাং সারদাং প্রণমাম্যহম।।”*
   আরও আগের কথা – ১৯০৭ খ্রিস্টাব্দের ১ ফেব্রুয়ারি। শ্রীমা জয়রামবাটীতে আছেন।
   ভক্ত জানিতে চাহিলেন যে ঠাকুর সনাতন পূর্ণব্রহ্ম কিনা। মা তাহা সমর্থন করিলে ভক্ত আবার বলিলেন, “তা প্রত্যেক স্ত্রীলোকেরই স্বামী পূর্ণব্রহ্ম সনাতন। আমি সেভাবে জিজ্ঞাসা করছি না।” মা উত্তর দিলেন, *”হ্যাঁ, তিনি পূর্ণব্রহ্ম সনাতন – স্বামী ভাবেও, এমনি ভাবেও।”*
   ভক্ত তখন ভাবিতেছেন, সীতারাম বা রাধাকৃষ্ণ যেমন অভিন্ন, ঠাকুর এবং মাও তেমনি অভিন্ন, অথচ সম্মুখে দেখিতেছেন মায়ের লোকোচিত ব্যবহার।
   মনের সন্দেহ মিটাইবার জন্য তিনি বলিতেছেন, “তবে যে তোমাকে এই দেখছি যেন সাধারণ স্ত্রীলোকের মতো বসে রুটি বেলছ, এসব কি? মায়া, না কি?”
   মা বলিলেন, *“মায়া বই কি! মায়া না হলে আমার এ দশা কেন? আমি বৈকুণ্ঠে নারায়ণের পাশে লক্ষ্মী হয়ে থাকতুম। ভগবান নরলীলা করতে ভালবাসেন কিনা!”*
   আবার প্রশ্ন হইল, “তোমার কি আপনার স্বরূপ মনে পড়ে না?” তদুত্তরে মা বলিলেন, *”হ্যাঁ, এক একবার মনে পড়ে; তখন ভাবি, এ কি করছি! এ কি করছি! আবার এইসব বাড়ি-ঘর ছেলেপিলে (সামনের সব দেখাইয়া) মনে আসে ও ভুলে যাই।”*
   আবার তিনি যে স্বেচ্ছায় মায়াবরণ স্বীকার করিয়াছেন ইহা তাঁহার জানাই ছিল; তাই এক এক সময় বলিতেন, *”এতো একটা মোহ নিয়ে আছি, এ একটা মায়া নিয়ে আছি বই তো নয়।”*
   অবতারলীলা মানবসদৃশ হইলেও, উহা ঠিক মানবের দৈনন্দিন কার্যাবলীর সহিত তুলিত হইতে পারে না; কেননা অনেকাংশেই উহা অন্যরূপ।
   শ্রীরামকৃষ্ণের জীবনী পাঠ করিলে দেখিতে পাওয়া যায় যে, যদিও তিনি মুহুর্মুহু সমাধিস্থ হইতেন, তথাপি ব্যুত্থিতাবস্থায় তাঁহার প্রতিকার্যে একটা সৌষ্ঠব ও সুশৃঙ্খলা ছিল।
   জনকল্যাণ ও লোকশিক্ষার্থে ধৃতবিগ্রহ পুরুষোত্তমের জীবনের সর্বক্ষেত্রই অপরের পক্ষে আদর্শস্থানীয় ছিল – বর্তমান কালে যুগাবতারের ইহা এক মহা অবদান।
   শ্রীমায়ের জীবনী আলোচনা করিলেও আমাদের মনে পুনঃ পুনঃ এই কথাই উদিত হয়। শুধু তাহাই নহে, আমাদের ইহাও মনে হয় যে, শ্রীরামকৃষ্ণ চরিত্রে যেমন দৈনন্দিন জীবনের উপযুক্ত অসাধারণ আদর্শের অভাব না থাকিলেও আধ্যাত্মিকভাব, মহাভাব ইত্যাদি অবিরাম প্রকটিত হইয়া আধুনিক জড়বাদসর্বস্ব মানবকে সবলে ভগবদভিমুখ করিয়াছে, শ্রীমায়ের জীবনে তেমনি চরম সমাধি, ত্যাগবৈরাগ্য ও ভাবগাম্ভীর্যের বিন্দুমাত্র ন্যুনতা না থাকিলেও তাঁহার চরিত্রে স্নেহ, সেবা, ঔদার্য, লজ্জা, বিনয় প্রভৃতি গুণরাজি অপূর্বভাবে প্রকাশ পাইয়া ভোগলোলুপ ব্যক্তিতন্ত্র লোকসমাজে এক নবীন প্রেরণা আনয়ন করিয়াছে। ফলত একটু অনুধাবন করিলেই দেখিতে পাওয়া যায় যে সাধারণ মানব আপনাকে লইয়াই বিব্রত; কিন্তু দেবমানবের সবটুকু জীবন পরার্থে।
*”জননীং সারদাং দেবীং রামকৃষ্ণং জগদ্‌গুরুম্।*

*পাদপদ্মে তয়ো শ্রিত্বা প্রণমামি মুহুর্মুহুঃ।।”*

वे ही बद्ध होकर पाप में लिप्त होते हैं। लाखों जन्म भोगकर, कष्ट पाकर अन्त में उन्हें ईश्वर को पाने की इच्छा होती है। …

पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा
पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा


*।श्री माँ कीअमृतवाणी।*

पुरुषार्थ एवं दैवीकृपा
*३४. शिष्य:-* _जो भगवानके ऊपर निर्भरकरके पड़े रहतेहैं पर साधनानहीं करते, क्याउन्हें ईश्वर की अनुभूतिहोगी?_
*श्रीमाँ :- वे पूर्णतयाईश्वर की शरणमें जाते हैं, उन पर पूर्णविश्वास रखकर जीवनयापनकरते हैंयहीउनकी साधना है।नरेन्द्र ने कहाथा, _‘होने दोमेरे लाखों जन्म, मुझे भय नहीं।’_ ज्ञानी को पुनर्जन्मका डर कहाँ? उनमें तो कोईपाप नहीं होता।अज्ञानी मनुष्य ही भयसे डरते हैं।वे ही संसारबन्धन में फँसजाते हैं। वेही बद्ध होकरपाप में लिप्तहोते हैं। लाखोंजन्म भोगकर, कष्टपाकर अन्त मेंउन्हें ईश्वर को पानेकी इच्छा होतीहै।गाय काबछड़ाहम्बा, हम्बा’ (मैं हूँ, मैंहूँ) करता है।उसकी खाल औरअंतड़ियों से जबढोल एवं अन्यवाद्य बनाते हैं, तब भी उसकीवही आवाज निकलतीहै। अन्त मेंवह धुनिया केहाथ में जाताहै और तभीतूँहूँ, तूँहूँ’ (तुम्हीं हो, तुम्हीं हो) कहताहै।*
जय जय माँ,जय माँ।

*।जपात् सिद्धिश्रीमाँ।*

श्री माँ की अमृतवाणी II Maa’s Amritwani

 *।श्री माँ की अमृतवाणी।*

पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा
*३३. हृदय के अन्तःस्थल से भगवन्नाम का जप करो और शुद्ध हृदय से ठाकुर के शरण में जाओ। आसपास की चीजों से तुम्हारे मन में क्या विचार आते हैं, इसके बारे में चिन्ता मत करो। आध्यात्मिक पथ में तुम प्रगति कर रहे हो या नहीं, इसके सम्बन्ध में भी हिसाब लगाने में और चिन्ता करने में समय मत गँवाओ। स्वयं की प्रगति के बारे में निर्णय करना अहंकार की निशानी है। गुरू एवं इष्ट की कृपा प़र विश्वास रखो।*
जय जय माँ,जय माँ।
*।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*

ईश्वर-प्राप्ति जीवन का उद्देश्य II पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा II *।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*

*।।ईश्वर-प्राप्ति जीवन का उद्देश्य।।*

 *।श्री माँ की अमृतवाणी।*

पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा
*२९. यदि तुम भगवान का स्मरण नहीं करते हो – सचमुच काफी लोग ईश्वर को मानते ही नहीं – तो इससे उनका क्या? यह तो तुम्हारा ही दुर्भाग्य है। भगवान की माया ही ऐसी है कि वे सब को इसी प्रकार भुलाए रखते हैं और कहते हैं, _‘वे सुखी हैं न, उन्हें वैसे ही रहने दो!’_*

जय जय माँ,जय माँ।

*।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*

Sri Ramakrishna Vachanamrita ।।श्रीरामकृष्ण वचनामृत।।

 ।।श्रीरामकृष्ण वचनामृत।।

Sri Ramakrishna
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Sri Ramakrishna

(भाग १-पेज-६०९ता.१४.९.१८८४)
अब हरिनाम के माहात्म्य की बात हो रही है।
_भवनाथ:- नाम करने पर मेरी देह हलकी पड़ जाती है।_
*श्रीरामकृष्ण :-“वे पाप का हरण करते हैं, इसीलिए उन्हें हरि कहते हैं। वे त्रिताप के हरण करनेवाले हैं।”*
   *“और चैतन्य देव ने इस नाम का प्रचार किया था, अतएव अच्छा है। देखो, चैतन्य देव कितने बड़े पण्डित थे और वे अवतार थे। उन्होंने इस नाम का प्रचार किया था, अतएव यह बहुत ही अच्छा है।(हँसते हुए) कुछ किसान एक न्योते में गये थे। भोजन करते समय उनसे पूछा गया, तुम लोग आमड़ें की खटाई खाओगे? उन्होंने कहा, बाबुओं ने अगर उसे खाया हो तो हमें भी देना। मतलब यह कि उन्होंने खाया होगा तो वह चीज अच्छी ही होगी।” (सब हँसते हैं।)* …….
(क्रमशः)…
जय जय रामकृष्ण।

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Ma’s Amritwani II श्री माँ की अमृतवाणी।* पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा

।श्री माँ की अमृतवाणी।*

पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा
*२८. ऐसे कितने लोग हैं जो सचमुच भगवान को चाहते हैं? कहाँ है ऐसी निष्ठा एवं व्याकुलता? एक ओर तो इनकी भक्ति आग्रह का भाव और दुसरी ओर जहाँ थोडे से भोग पदार्थ मिल जाएँ तो उसी में सन्तुष्ट। कहते हैं, ‘उनकी कैसी दया है।’*
जय जय माँ,जय माँ।
*।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*

Sri Ramakrishna Vcnamrit।।श्रीरामकृष्ण वचनामृत। ईश्वर-प्राप्ति जीवन का उद्देश्य।।

 ।।श्रीरामकृष्ण वचनामृत।।

(भाग १-पेज-६०९ता.१४.९.१८८४)

_गवयै के साथ नरेन्द्र का वादविवाद हुआ था, उसी की बात चल रही है। ….._
_मुखर्जी:- नरेंद्र ने भी मोर्चा नहीं छोड़ा।_
*श्रीरामकृष्ण :-“हाँ, ऐसी दृढ़ता तो चाहिए ही। इसे सत्व का तम कहते हैं। लोग जो कुछ कहेंगे क्या उसी पर विश्वास करना होगा? वेश्या से क्या यह कहा जायगा कि तुम्हें जो रूचे वही करो? तो वेश्या की बात भी माननी होगी। मान करने पर एक सखी ने कहा था – ‘राधिका को अहंकार हुआ है।’ वृन्दे ने कहा, “यह ‘अहं’ किसका है? – यह उन्हीं का अहंकार है – कृष्ण के ही गर्व से वे गर्व करती हैं।”*  ……(क्रमशः)…
जय जय रामकृष्ण।
*।।ईश्वर-प्राप्ति जीवन का उद्देश्य।।*

पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा II *।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*

।श्री माँ की अमृतवाणी।*

पुरुषार्थ एवं दैवी कृपा
*२७. 
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  1. साधना में, कथनी और करनी में सच्चे रहो। 
  2. तुम धन्य हो जाओगे!उनका आशिर्वाद जगत के सभी प्राणियों पर सदैव बरस रहा है। 
  3. उसके लिए निवेदन करने की आवश्यकता नहीं। 
  4. सच्चे मन से ध्यान करो। 
  5. तब तुम्हें उनकी असीम कृपा का बोध होगा। 
  6. ईश्वर चाहते हैं सरलता-निष्कपटता, सच्चाई और प्रेम। 
  7. केवल भावपूर्ण शब्दों की झड़ी से उन्हें प्रसन्न नहीं किया जा सकता।*
जय जय माँ,जय माँ।
*।जपात् सिद्धि-श्रीमाँ।*

কালী — আমিই সব। আমি সৃষ্টি, স্থিতি, প্রলয় করছি II নরেন্দ্র, রাখাল প্রভৃতি মঠের ভাইদের ৺শিবরাত্রি ব্রত বরাহনগর মঠ

তাথৈয়া তাথৈয়া নাচে ভোলা, বববম্, বাজে গাল।  ডিমি ডিমি ডিমি ডমরু বাজে দুলিছে কপাল মাল।  গরজে গঙ্গা জটা মাঝে, উগরে অনল-ত্রিশূল রাজে।  ধক্ ধক্ ধক্ মৌলি বন্ধ, জ্বলে শশাঙ্ক ভাল ৷৷


শ্রীশ্রী রামকৃষ্ণ কথামৃত –৫৮/বরাহনগর মঠ

প্রথম পরিচ্ছেদ
১৮৮৭, ২১ – ২২শে ফেব্রুয়ারি

নরেন্দ্র, রাখাল প্রভৃতি মঠের ভাইদের ৺শিবরাত্রি ব্রত  বরাহনগর মঠ। 

শ্রীযুক্ত নরেন্দ্র, রাখাল প্রভৃতি আজ ৺শিবরাত্রির উপবাস করিয়া আছেন। দুইদিন পরে ঠাকুরের জন্মতিথি পূজা হইবে।
বরাহনগর মঠ সবে পাঁচ মাস স্থাপিত হইয়াছে। ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণ নিত্যধামে বেশিদিন যান নাই। নরেন্দ্র রাখাল প্রভৃতি ভক্তদের তীব্র বৈরাগ্য। একদিন রাখালের পিতা বাড়ি ফিরিয়া যাইবার জন্য রাখালকে অনুরোধ করিতে আসিয়াছিলেন। রাখাল বলিলেন, “কেন আপনারা কষ্ট করে আসেন! আমি এখানে বেশ আছি। এখন আশীর্বাদ করুন, যেন আপনারা আমায় ভুলে যান, আর আমি আপনাদের ভুলে যাই।” সকলেরই তীব্র বৈরাগ্য! সর্বদা সাধনভজন লইয়া আছেন। এক উদ্দেশ্য — কিসে ভগবানদর্শন হয়।
নরেন্দ্রাদি ভক্তেরা কখনও জপ-ধান করেন, কখনও শাস্ত্রপাঠ করেন। নরেন্দ্র বলেন, “গীতায় ভগবান যে নিষ্কামকর্ম করতে বলেন — সে পূজা, জপ, ধ্যান এই সব কর্ম — অন্য কর্ম নহে।”
আজ সকালে নরেন্দ্র কলিকাতায় আসিয়াছেন। বাটীর মোকদ্দমায় তদ্বির করিতে হইতেছে। আদালতে সাক্ষি দিতে হয়।
মাস্টার বেলা নয়টার সময় মঠে উপনীত হইয়াছেন। দানাদের ঘরে প্রবেশ করিলে পর তাঁহাকে দেখিয়া শ্রীযুক্ত তারক আনন্দে শিবের গান ধরিলেন —
‘তাথৈয়া তাথৈয়া নাচে ভোলা।
তাঁহার গানের সহিত রাখালও যোগ দিলেন। আর গান গাহিয়া দুইজনেই নৃত্য করিতেছেন। এই গান নরেন্দ্র সবে বাঁধিয়াছেন।

তাথৈয়া তাথৈয়া নাচে ভোলা, বববম্, বাজে গাল।
ডিমি ডিমি ডিমি ডমরু বাজে দুলিছে কপাল মাল।
গরজে গঙ্গা জটা মাঝে, উগরে অনল-ত্রিশূল রাজে।
ধক্ ধক্ ধক্ মৌলি বন্ধ, জ্বলে শশাঙ্ক ভাল ৷৷

মঠের ভাইয়েরা সকলে উপবাস করিয়া আছেন। ঘরে এখন নরেন্দ্র, রাখাল, নিরঞ্জন, শরৎ, শশী, কালী, বাবুরাম, তারক, হরিশ, সিঁথির গোপাল, সারদা, মাস্টার আছেন। যোগীন, লাটু শ্রীবৃন্দাবনে আছেন। তাঁহারা এখনও মঠ দেখেন নাই।
আজ শোমবার ৺শিবরাত্রি, ২১শে ফেব্রুয়ারি, ১৮৮৭। আগামী শনিবারে শরৎ, কালী, নিরঞ্জন, সারদা, শ্রীশ্রীজগন্নাথ দর্শনার্থ ৺পুরীধামে যাত্রা করিবেন।

শ্রীযুক্ত শশী দিনরাত ঠাকুরের সেবা লইয়া আছেন।
পূজা হইয়া গেল। শরৎ তানপুরা লইয়া গান গাইতেছেন:
শিব শঙ্কর বম্ বম্ (ভোলা), কৈলাসপতি মহারাজরাজ!
উড়ে শৃঙ্গ কি খেয়াল, গলে ব্যাল মাল, লোচন বিশাল, লালে লাল;
ভালে চন্দ্র শোভে, সুন্দর বিরাজে।
নরেন্দ্র কলিকাতা হইতে এইমাত্র আসিয়াছেন। এখনও স্নান করেন নাই। কালী নরেন্দ্রকে জিজ্ঞাসা করিলেন, মোকদ্দমার কি খবর?

নরেন্দ্র (বিরক্ত হইয়া) — তোদের ও-সব কথায় কাজ কি?

নরেন্দ্র তামাক খাইতেছেন ও মাস্টার প্রভৃতির সহিত কথা কহিতেছেন। — “কামিনী-কাঞ্চনত্যাগ না করলে হবে না। কামিনী নরকস্য দ্বারম্। যত লোক স্ত্রীলোকে বশ। শিব আর কৃষ্ণ এদের আলাদা কথা। শক্তিকে শিব দাসী করে রেখেছিলেন। শ্রীকৃষ্ণ সংসার করেছিলেন বটে, কিন্তু কেমন নির্লিপ্ত! ফস করে বৃন্দাবন কেমন ত্যাগ করলেন!”
রাখাল — আবার দ্বারিকা কেমন ত্যাগ করলেন!
নরেন্দ্র গঙ্গাস্নান করিয়া মঠে ফিরিলেন। হাতে ভিজে কাপড় ও গামছা। সারদা এতক্ষণ সমস্ত গায়ে মাটি মাখা — আসিয়া নরেন্দ্রকে সাষ্টাঙ্গ হইয়া নমস্কার করিলেন। তিনিও শিবরাত্রির উপবাস করিয়াছেন — গঙ্গাস্নানে যাইবেন। নরেন্দ্র ঠাকুরঘরে গিয়া ঠাকুর প্রণাম করিলেন ও উপবিষ্ট হইয়া কিয়ৎকাল ধ্যান করিলেন।
ভবনাথের কথা হইতেছে। ভবনাথ বিবাহ করিয়াছেন, কর্ম কাজ করিতে হইতেছে। নরেন্দ্র বলিতেছেন, “ওরা তো সংসারী কীট!”
অপরাহ্ন হইল। শিবরাত্রির পূজার আয়োজন হইতেছে। বেলকাঠ ও বিল্বপত্র আহরণ করা হইল। পূজান্তে হোম হইবে।
সন্ধ্যা হইয়াছে। ঠাকুরঘরে ধুনা দিয়া শশী অন্যান্য ঘরেও ধুনা লইয়া গেলেন। প্রত্যেক দেবদেবীর পটের কাছে প্রণাম করিয়া অতি ভক্তিভরে নাম উচ্চারণ করিতেছেন। “শ্রীশ্রীগুরুদেবায় নমঃ! শ্রীশ্রীকালিকায়ৈ নমঃ! শ্রীশ্রীজগন্নাথ-সুভদ্রা-বলরামেভ্যো নমঃ! শ্রীশ্রীষড়্ভুজায় নমঃ! শ্রীশ্রীরাধাবল্লভায় নমঃ! শ্রীশ্রীনিত্যানন্দায়, শ্রীঅদ্বৈতায়, শ্রীভক্তেভ্যো নমঃ! শ্রীগোপালায়, শ্রীশ্রীযশোদায়ৈ নমঃ! শ্রীরামায়, শ্রীলক্ষ্মণায়, শ্রীবিশ্বামিত্রায় নমঃ!”
মঠের বেলতলায় শিবপূজার আয়োজন। রাত্রি নয়টা। এইবার পূজা হইবেক। সাড়ে এগারটার সময় দ্বিতীয় পূজা। চারি প্রহরে চার পূজা। নরেন্দ্র, রাখাল, শরৎ, কালী, সিঁথির গোপাল প্রভৃতি মঠের ভাইরা সকলেই বেলতলায় উপস্থিত। ভূপতি ও মাস্টারও আছেন। মঠের ভাইদের মধ্যে একজন পূজা করিতেছেন।
কালী গীতা পাঠ করিতেছেন। সৈন্যদর্শন, সাংখ্যযোগ — কর্মযোগ। পাঠের মধ্যে মধ্যে নরেন্দ্রের সহিত কথা ও বিচার হইতেছে।

কালী — আমিই সব। আমি সৃষ্টি, স্থিতি, প্রলয় করছি।

নরেন্দ্র — আমি সৃষ্টি করছি কই? আর এক শক্তিতে আমায় করাচ্ছে। এই নানা কার্য, — চিন্তা পর্যন্ত, তিনি করাচ্ছেন।
মাস্টার (স্বগত) — ঠাকুর বলেন, যতক্ষণ আমি ‘ধ্যান করছি’ এই বোধ, ততক্ষণও আদ্যাশক্তির এলাকা! শক্তি মানতেই হবে।
কালী নিস্তব্ধ হইয়া কিয়ৎক্ষণ চিন্তা করিতেছেন। তারপর বলিতেছেন — “কার্য যা বললে, ও-সব মিথ্যা! — চিন্তা আদপেই হয় নাই — ও-সব মনে করলে হাসি পায় –”
নরেন্দ্র — ‘সোঽহম্ বললে যে ‘আমি’ বোঝায়, সে এ ‘আমি’ নয়। মন, দেহ এ-সব বাদ দিলে যা থাকে, সেই ‘আমি’!’
গীতা পাঠান্তে কালী শান্তিবাদ করিতেছেন — শান্তিঃ! শান্তিঃ! শান্তিঃ!
এইবার নরেন্দ্রাদি ভক্তেরা সকলে দণ্ডায়মান হইয়া নৃত্য গীত করিতে করিতে বিল্বমূল বারবার পরিক্রমণ করিতেছেন। মাঝে মাঝে সমস্বরে ‘শিবগুরু’! শিবগুরু’! এই মন্ত্র উচ্চারণ করিতেছেন। গভীর রাত্রি। কৃষ্ণপক্ষের চতুর্দশী তিথি। চারিদিক অন্ধকার! জীবজন্তু সকলেই নিস্তব্ধ।
গৈরিক বস্ত্রধারী, এই কৌমারবৈরাগ্যবান ভক্তগণের কণ্ঠে উচ্চারিত ‘শিবগুরু! শিবগুরু।’ এই মহামন্ত্রধ্বনি মেঘগম্ভীররবে অনন্ত আকাশে উঠিয়া অখণ্ড সচ্চিদানন্দে লীন হইতে লাগিল!
পূজা সমাপ্ত হইল: অরুণোদয় হয় হয়। নরেন্দ্রাদি ভক্তগণ ব্রাহ্মমুহূর্তে গঙ্গাস্নান করিলেন।
সকাল (২২শে ফেব্রুয়ারি) হইল। স্নানান্তে ভক্তগণ মঠে ঠাকুরঘরে গিয়া ঠাকুরকে প্রণামান্তর দানাদের ঘরে (অর্থাৎ বৈঠকখানার ঘরে) ক্রমে ক্রমে আসিয়া একত্রিত হইতেছেন। নরেন্দ্র সুন্দর নব গৈরিকবস্ত্র ধারণ করিয়াছেন। বসনের সৌন্দর্যের সঙ্গে তাহার মুখের ও দেহের তপস্যাসম্ভূত অপূর্ব স্বর্গীয় পবিত্র জ্যোতিঃ মিশাইয়াছে! বদনমণ্ডল তেজঃপরিপূর্ণ, আবার প্রেমানুরঞ্জিত! যেন অখণ্ড সচ্চিদানন্দ-সাগরের একটি ফুট জ্ঞান-ভক্তি শিখাইবার জন্য দেবদেহ ধারণ করিয়াছেন — অবতার লীলায় সহায়তার জন্য। যে দেখিতেছে, সে আর চক্ষু ফিরাইতে পারিতেছে না। নরেন্দ্রের বয়ঃক্রম ঠিক চতুর্বিংশতি বৎসর। ঠিক এই বয়সে শ্রীচৈতন্য সংসারত্যাগ করিয়াছিলেন।
ভক্তদের পারনের জন্য শ্রীযুক্ত বলরাম তাঁহার বাটী হইতে ফল মিষ্টান্নাদি পূর্বদিনেই (শিবরাত্রির দিনে) পাঠাইয়াছেন।
রাখাল প্রভৃতি দু-একটি ভক্তসঙ্গে নরেন্দ্র ঘরে

Sri Ramakrishna
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দাঁড়াইয়া দাঁড়াইয়া কিঞ্চিৎ জলযোগ করিতেছেন। একটি-দুটি খাইয়াই আনন্দ করিতে করিতে বলিতেছেন, ‘ধন্য বলরাম’ ‘ধন্য বলরাম!’ (সকলের হাস্য)
এইবার নরেন্দ্র বালকের ন্যায় রহস্য করিতেছেন। রসগোল্লা মুখে করিয়া একেবারে স্পন্দহীন! চক্ষু নিমেষশূন্য! নরেন্দ্রের অবস্থা দেখিয়া একজন ভক্ত ভান করিয়া তাঁহাকে ধারণ করিলেন — পাছে পড়িয়া যান!
কিয়ৎক্ষণ পরে নরেন্দ্র — (রসগোল্লা মুখে রহিয়াছে) — চোখ চাহিয়া বলিতেছেন, ‘আমি — ভাল — আছি!’ (সকলের হাস্য)
মাস্টার প্রভৃতিকে সিদ্ধি ও প্রসাদ মিষ্টান্ন বিতরণ করা হইল।
মাস্টার আনন্দের হাট দেখিতেছেন। ভক্তেরা জয়ধ্বনি করিতেছেন।
— “জয় গুরু মহারাজ! জয় গুরু মহারাজ!” —

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