শ্রীকালিকা তন্ত্রের দেবী। তিনি আদিরূপা ও সাক্ষাৎ. কৈবল্যদায়িনী।
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তিনি সেইসময় কয়েকদিন এই আশ্রমে থেকে অনেক ভক্তকে আনন্দ দিয়েছেন ।
ঋণস্বীকার( কালীক্ষেত্রে রামকৃষ্ণ মঠ)…..
SRI RAMAKRISHNA TODAY
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Once, vibhishana was imprisoned by some Brahmanas. When Sri Rama Chandra, the gem of Raghu dynasty, heard that his great devotee was in distress, he became much worried. He sent his messengers in all directions in search of Vibhishana. Finally, the whereabouts of Vibhishana was found. Sri Ramachandra himself went to meet Vibhishana. And what a sight he saw! The Brahmanas had tied Vibhishana’s hands and legs and imprisoned him in a cellar. Sri Ramachandra was shocked at this plight of this great devotee with good qualities. He enquired the Brahmanas about Vibhishana’s crime. Upon seeing Sri Ramachandra, the Brahmanas prostrated at his feet and welcomed him with great honor. Then, they said to him: ‘O Lord! One day,
✍एक पान वाला था। जब भी पान खाने जाओ ऐसा लगता कि वह हमारा ही रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर बात करने में उसे बड़ा मज़ा आता। कई बार उसे कहा की भाई देर हो जाती है जल्दी पान लगा दिया करो पर उसकी बात ख़त्म ही नही होती।
एक दिन अचानक कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई
तक़दीर और तदबीर की बात सुन मैनें सोचा कि चलो आज उसकी फ़िलासफ़ी देख ही लेते हैं। मैंने एक सवाल उछाल दिया।
मेरा सवाल था कि आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?
और उसके जवाब से मेरे दिमाग़ के सारे जाले ही साफ़ हो गए।
कहने लगा,आपका किसी बैंक में लाकर तो होगा?
उसकी चाभियाँ ही इस सवाल का जवाब है। हर लाकर की दो चाभियाँ होती हैं।
एक आप के पास होती है और एक मैनेजर के पास।
आप के पास जो चाभी है वह है परिश्रम और मैनेजर के पास वाली भाग्य।
जब तक दोनों नहीं लगतीं ताला नही खुल सकता।
आप कर्मयोगी पुरुष हैं ओर मैनेजर भगवान।
अाप को अपनी चाभी भी लगाते रहना चाहिये।पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाभी लगा दे। कहीं ऐसा न हो की भगवान अपनी भाग्यवाली चाभी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाभी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाये ।
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ভগবান যখন তাঁর অসীম কৃপায় গুরুমুখে তাঁর সিদ্ধমন্ত্র দিয়েছেন, তাঁকে পাবার চাবিকাঠি দিয়েছেন – তখন জানবে তিনি নিজেকে বিলিয়ে দিয়েছেন | এখন তোমার সেইটি ধারণা হওয়া চাই | যদি সেই অমূল্য রত্নকে অযত্নে ও অবহেলায় হারাও তো জানবে তুমি তাঁর কৃপার অযোগ্য | তাঁর কদর করা মানে গুরুদত্ত মন্ত্র ও উপদেশ সর্বান্ত:করণে সাধন ও পালন করা, যতদিন না বস্তু লাভ হয় | তাহলে গুরুর ঋণের কথঞ্চিৎ প্রতিদান করা হবে | ভগবানকে যত আপনার হতে আপনার বলে জানবে, ততই তুমি তাঁর কৃপার অধিকারী হবে, তাঁর কৃপার এ জন্মেই জীবন্মুক্ত, নিত্যানন্দময় হবে |
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| Swami saradananda |