আমাদের…অতীত মহৎ ভবিষ্যত মানুষের সেবা করা হচ্ছে ঈশ্বরের সেবা করা ঈশ্বরপ্রেম ঈশ্বর মানুষ ধর্ম হচ্ছে মানুষের মধ্যে ইতোমধ্যে থাকা দেবত্বের প্রকাশ ধর্ম

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বাণী চিরন্তণী

স্বামী বিবেকানন্দ

স্বামী বিবেকানন্দ (১২ জানুয়ারি, ১৮৬৩ –৪ জুলাই, ১৯০২; পিতৃদত্ত নাম নরেন্দ্রনাথ দত্ত) ছিলেন একজন ভারতীয় হিন্দু সন্ন্যাসী এবং উনবিংশ শতাব্দীর হিন্দু ধর্মগুরু পরমহংসের প্রধান শিষ্য। পাশ্চাত্য জগতে ভারতের বেদান্ত ও যোগ দর্শনকে পরিচিত করে তোলার ক্ষেত্রে তিনি অন্যতম প্রধান ভূমিকা গ্রহণ করেছিলেন। উনবিংশ শতাব্দীতে বিভিন্ন ধর্মাবলম্বী মানুষের মধ্যে একে অপরের ধর্ম সম্পর্কে সচেতনতা বৃদ্ধি এবং হিন্দুধর্মকে বিশ্বের অন্যতম প্রধান ধর্মের মর্যাদা অর্জনের ক্ষেত্রেও তাঁর বিশেষ অবদান রয়েছে। বিবেকানন্দ ছিলেন ভারতে হিন্দু নবজাগরণের অন্যতম পথিকৃত এবং ব্রিটিশ ভারতে জাতীয়তাবাদী ধারণার অন্যতম প্রবক্তা। তিনি রামকৃষ্ণ মঠ ও রামকৃষ্ণ মিশন প্রতিষ্ঠা করেন।

Swami Vivekananda

Swami Vivekananda
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বাণী সমূহ আমাদের জাতীয় জীবন অতীতকালে মহৎ ছিল, তাহাতে সন্দেহ নাই, কিন্তু আমি অকপটভাবে বিশ্বাস করি যে, আমাদেরঅতীত মহৎ ভবিষ্যত মানুষের সেবা করা হচ্ছে ঈশ্বরের সেবা করা ঈশ্বরপ্রেম ঈশ্বর মানুষ ধর্ম হচ্ছে মানুষের মধ্যে ইতোমধ্যে থাকা দেবত্বের প্রকাশ ধর্ম  শিক্ষা হচ্ছে মানুষের মধ্যে ইতোমধ্যে থাকা উৎকর্ষের প্রকাশ শিক্ষা
জেগে ওঠো, সচেতন হও এবং লক্ষ্যে না পৌঁছা পর্যন্ত থেমো না অনুপ্রেরণা আদানপ্রদানই প্রকৃতির নিয়ম; ভারতের যদি আবার উঠিতে হয়, তবে তাহাকে নিজ ঐশ্বর্যভান্ডার উন্মুক্ত করিপৃথিবী ভারত  আমাদের জাতের কোনও ভরসা নাই। কোনও একটা স্বাধীন চিন্তা কাহারও মাথায় আসে না সেই ছেঁড়া কাঁথা, সকলে চিন্তা জাতি আমাদের দেশের শতকরা নব্বই জনই অশিক্ষিত,অথচ কে তাহাদের বিষয় চিন্তা করে? এইসকল বাবুর দল কিংবা তথাকথিশিক্ষা দেশ বেদান্তে সংগ্রামের স্থান আছে, BB কিন্তু ভয়ের স্থান নাই। যখনই স্বরূপ সম্বন্ধে দৃঢ়ভাবে সচেতন হইতে শুরুভয় ধর্ম দর্শন সংগ্রাম
অন্ন! অন্ন! যে ভগবান এ

What is not civilization? Swami Vivekananda II उतावले मत बनो, किसी दूसरे का अनुकरण करने की चेष्टा मत करो। दूसरों का अनुकरण करना सभ्यता की निशानी नहीं है; यह एक महान् पाठ है, जो हमें याद रखना है। स्वामी विवेकानन्द.

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What is not civilization? 

                  Do not be in a hurry, do not go out to imitate anybody else. This is another great lesson we have to remember; imitation is not civilization.
Swami Vivekananda
उतावले मत बनो, किसी दूसरे का अनुकरण करने की चेष्टा मत करो। दूसरों का अनुकरण करना सभ्यता की निशानी नहीं है; यह एक महान् पाठ है, जो हमें याद रखना है।
स्वामी विवेकानन्द.

One feeling—– Swami Someshwantanji

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এক অনুভূতি

বেলুড় মঠে শ্রীরামকৃষ্ণ মন্দিরে তখন নিত্যপুজো করতেন ননীগোপাল মহারাজ ।
একবার ভোরে শ্রীরামকৃষ্ণের শয়নঘরে এসেছেন তিনি কাজে । ব্রাহ্মমুহূর্ত। চারদিক তখনো অন্ধকার । ঘরে ঢুকতেই দেখলেন,
এক লম্বা আলোর জ্যোতি বেলুড়মঠের শ্রীরামকৃষ্ণ মন্দির ও দক্ষিণেশ্বরের কালীমন্দিরকে যুক্ত করে রয়েছে । যেন এক আলোর সেতু । বিস্ময়ের ঘোর কাটিয়ে তিনি আবার তাকালেন ঐ জ্যোতির্ময় পথের দিকে । আকাশে সাদা তীব্র আলোর জ্যোতির্ময় নদী যেন ।
            —– স্বামী সোমেশ্বরানন্দজী

राजा मानसिंह द्ववारा गोविन्ददे के मन्दिर का निर्माण*

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राजा मानसिंह द्ववारा गोविन्ददेके मन्दिर का निर्माण*

रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के शिष्य द्वारा बनवाया गोविन्ददेव का मन्दिर बहुत दिन बाद जीर्णशीर्ण हो गया। तब सन् 1590 में राजा मानसिंह ने बहुत अर्थ व्यय कर वर्तमान लाला पत्थर के विशाल मन्दिर का निर्माण किया, जिसे उत्तर भारत का सबसे आकर्षक और हिन्दू स्थापत्य का अतुलनीय दृष्टांत माना जाता है।
इस मन्दिर का निर्माण करने का जब मानसिंह ने विचार किया, उस समय अकबर बादशाह पूर्वी राजस्थान के लाल पत्थर से आगरे के क़िले का निर्माण करवा रहे थे। इस लाल पत्थर को प्राप्त करने का और किसी को अधिकार नहीं था। पर मानसिंह उस समय अकबर के सेनापति थे, और उनके बड़े विश्वासपात्र थे। मानसिंह के अनुरोध पर उन्होंने गोविन्ददेव के मन्दिर के लिए बिना मूल्य इस पत्थर को देने की अनुमति दे दी। एक सौ तीस बीधा ज़मीन भी मन्दिर की सेवा के लिए भेंट कर दी।
मानसिंह की मृत्यु (सन् 1614) के बाद सौ वर्ष से भी अधिक यह मन्दिर अपने पूरे गौरवगरिमा के साथ भक्तों और तीर्थयात्रियों के आकर्षण का प्रधान केन्द्र बना रहा। पर हिन्दूविद्रोही बादशाह औरंगजेब के नेत्रों में इसका खटकना स्वाभाविक था। उसके द्वारा मन्दिर को नष्ट किये जाने के भय से गोविन्ददेव को पहले आमेर की घाटी में एक मन्दिर बनवाकर उसमें विराजमान किया गया। जब महाराज जयसिंह ने जयपुर बसाया, तब पहले जयनिवास में मन्दिर बनवाकर उसमें गोविन्दजी को ले जाया गया। उसके सामने चन्द्रमहल का निर्माण इस प्रकार किया कि राज महल से गोविन्ददेव के दर्शन कर सकें। राजा वैष्णव थे। वे गोविन्द देव को ही रियासत का राजा मानते और स्वयं उनके दीवान की हैसियत से राजकार्य चलाते। रियासत की मोहर पर लिखा होता महाराजाधिराज श्रीश्रीगोविन्ददेवजी, दीवान महाराजा जयसिंह।आज भी गोविन्ददेव उसी मन्दिर में विराजमान हैं। महाप्रभु के गौरगोविन्द विग्रह भी उनके दाहिने पार्श्व में उसी सिंहासन पर विराजमान हैं।
वृन्दावन के मन्दिर का प्रधान चूड़ा इतना ऊँचा था कि उसके आलोक मंच से विच्छुरित आलोकराशि आगरा से देखी जा सकती थी। जब औरंगजेब को पता चला कि यह आलोकराशि हिन्दुओं के इस मन्दिर की है, तो उसने एक फ़ौजदार को भेजकर उसके मूल मन्दिर और उससे संलग्न पांच चूड़ा ध्वंस करवा दिये। फ़ौजदार के वृन्दावन आने के पूर्व ही गोविन्ददेव के विग्रह औ अन्य प्रधानप्रधान विग्रहों को जयपुर पहुँचा दिया गया था। दिल्ली के बादशाह मोहम्मद शाह के राजत्वकाल (1729-48) में किसी समय वृन्दावनवासी भक्तों ने गोविन्दजी की एक प्रतिमूर्ति पधरा दी। सन् 1819 में नन्दकुमार बसू नामक एक भक्त ने मानसिंह के मन्दिर के उत्तर पश्चिम में एक नया मन्दिर बनवाकर उस मूर्ति को वहाँ स्थापित किया। आज भी गोविन्ददेव वहीं विराजमान हैं।

कुछ प्रेमयुक्त रोष से चौबे की पत्नी ने कहा "इसकी तो आदत ही ऐसी हे, जो भला अपनी सगी माँ का न हुआ तो मेरा क्या होगा।"

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भक्तमाल कथा

चटोरे मदनमोहन जी🍲
सनातन गोस्वामी जी मथुरा में एक चौबे के घर मधुकरी के लिए जाया करते थे, उस चौबे की स्त्री परमभक्त और मदन मोहन जी की उपासिका थी, उसके घर बाल भाव से मदन मोहन भगवान विराजते थे।
असल में सनातन जी उन्ही मदन मोहन जी के दर्शन हेतु प्रतिदिन मधुकरी के बहाने जाया करते थे।
मदन मोहन जी तो ग्वार ग्वाले ही ठहरे ये आचार विचार क्या जाने उस चौबे के लड़के के साथ ही एक पात्र में भोजन करते थे, ये देख सनातन जी को बड़ा आश्चर्य हुआ, ये मदनमोहन तो बड़े वचित्र है।
एक दिन इन्होने आग्रह करके मदन मोहन जी का उच्छिष्ठ (झूठा) अन्न मधुकरी में माँगा, चौबे की स्त्री ने भी स्वीकार करके दे दिया, बस फिर क्या था, इन्हे उस माखन चोर की लपलपाती जीभ से लगे हुए अन्न का चश्का लग गया, ये नित्य उसी अन्न को लेने जाने लगे।
एक दिन मदन मोहन ने इन्हे स्वप्न में दर्शन देकर कहा, “बाबा तुम रोज इतनी दूर से आते हो, और इस मथुरा शहर में भी हमे ऊब सी मालूम होवे हे, तुम उस चौबे से हमको मांग के ले आओ हमको भी तुम्हारे साथ जंगल में रहनो है।
ठीक उसी रात को चौबे को भी यही स्वप्न हुआ की हमको आप सनातन बाबा को दान कर दो।
दूसरे दिन सनातन जी गये उस चौबे के घर और कहने लगे मदन मोहन को अब जंगल में हमारे साथ रहना है, आपकी क्या इच्छा है?”

कुछ प्रेमयुक्त रोष से चौबे की पत्नी ने कहा इसकी तो आदत ही ऐसी हे, जो भला अपनी सगी माँ का न हुआ तो मेरा क्या होगा।

और ठाकुर जी की आज्ञा जान अश्रुविमोचन करते हुए थमा दिया मदन मोहन जी को सनातनजी को।
अब मदन मोहन को लेके ये बाबा जंगल में यमुना किनारे आये और सूर्यघाट के समीप एक सुरम्य टीले पे फूस की झोपडी बना के मदन मोहन को स्थापित कर पूजा करने लगे।
सनातन जी घर घर से चुटकी चुटकी आटा मांग के लाते और उसी की बिना नमक की बाटिया बना के मदन मोहन को भोग लगाते।
एक दिन मदन मोहन जी ने मुँह बिगाड़ के कहा:- “ओ बाबा ये रोज रोज बिना नमक की बाटी हमारे गले से नीचे नहीं उतरती, थोड़ा नमक भी मांग के लाया करो ना।
सनातन जी ने झुँझलाकर कहा:- “यह इल्लत मुझसे न लगाओ, खानी हो तो ऐसी ही खाओ वरना अपने घर का रास्ता पकड़ो।
मदन मोहन ने हस के कहा:- “एक कंकड़ी नमक के लिये कौन मना करेगा“, और ये जिद करने लगे।
दूसरे दिन ये आटे के साथ थोड़ा नमक भी मांग के लाने लगे।
चटोरे मदन मोहन को तो माखन मिश्री की चट पड़ी थी, एक दिन बड़ी दीनता से बाबा से बोले:- “बाबा ये रूखे टिक्कड तो रोज रोज खावे ही न जाये, थोड़ा माखन या घी भी कही से लाया करो तो अच्छा रहेगा।
अब तो सनातन जी मदन मोहन को खरीखोटी सुनाने लगे, उन्होंने कहा:- “देखो जी मेरे पास तो यही सूखे टिक्कड है, तुम्हे घी और माखन मिश्री की चट थी तो कही धनी सेठ के वहां जाते, ये भिखारी के वहां क्या करने आये हो, तुम्हारे गले से उतरे चाहे न उतरे, में तो घीबुरा माँगने बिल्कुल नही जाने वाला, थोड़े यमुना जी के जल के साथ सटक लिया करो ना, मिट्टी भी तो सटक लिया करते थे।
बेचारे मदन मोहन जी अपना मुँह बनाए चुप हो गये, उस लंगोटि बन्ध साधु से और कह भी क्या सकते थे।
दूसरे दिन सनातन जी ने देखा कोई बड़ा धनिक व्यापारी उनके समीप आ रहा हे, आते ही उसके सनातन जी को दण्डवत प्रणाम किया और करुण स्वर में कहने लगा:- “महात्मा जी मेरा जहाज बीच यमुना जी में अटक गया है, ऐसा आशीर्वाद दीजिये की वो निकल जाये।
सनातन जी ने कहा:- “भाई में कुछ नही जानता, इस झोपडी में जो बैठा है न उससे जाके कहो।
व्यापारी ने झोपड़े में जा के मदन मोहन जी से प्रार्थना की, बस फिर क्या था इनकी कृपा से जहाज उसी समय निकल गया, उसी समय उस व्यापारी ने हजारो रूपए लगा के बड़ी उदारता के साथ मदन मोहन जी का वही भव्य मंदिर बनवा दिया, और भगवान की सेवा के लिए बहुत सारे सेवक, रसोइये और नोकर चाकर रखवा दिये।
*वह मंदिर वृंदावन में आज भी विध्यमान है…*
*जय जय श्री राधे*

एक छोटा सा बोर्ड रेहड़ी की छत से लटक रहा था,उस पर मोटे मारकर से लिखा हुआ था…..!!

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एक छोटा सा बोर्ड रेहड़ी की छत से लटक रहा था,उस पर मोटे मारकर से लिखा हुआ था…..!!

घर मे कोई नही है,मेरी बूढ़ी माँ बीमार है,मुझे थोड़ी थोड़ी देर में उन्हें खाना,दवा और हाजत कराने के लिए घर जाना पड़ता है,अगर आपको जल्दी है तो अपनी मर्ज़ी से फल तौल ले और पैसे कोने पर गत्ते के नीचे रख दें,साथ ही रेट भी लिखे हुये हैं
और अगर आपके पास पैसे नही हो तो मेरी तरफ से ले लेना,इजाजत है..!!
मैंने इधर उधर देखा,पास पड़े तराजू में दो किलो सेब तोले,दर्जन भर केले लिए,बैग में डाले,प्राइज लिस्ट से कीमत देखी,पैसे निकाल कर गत्ते को उठाया वहाँ सौ पच्चास और दस दस के नोट पड़े थे,मैंने भी पैसे उसमे रख कर उसे ढक दिया।बैग उठाया और अपने फ्लैट पे आ गया,इफ्तार के बाद मैं और भाई उधर निकले तो देखा एक कमज़ोर सा आदमी,दाढ़ी आधी काली आधी सफेद,मैले से कुर्ते पजामे में रेहड़ी को धक्का लगा कर बस जाने ही वाला था ,वो हमें देख कर मुस्कुराया और बोला साहब! फल तो खत्म हो गए
नाम पूछा तो बोला  अरसद हुसैन
फिर हम सामने वाले ढाबे पर बैठ गए
चाय आयी,कहने लगा पिछले तीन साल से अम्मा बिस्तर पर हैं,कुछ पागल सी भी हो गईं है,और अब तो फ़ालिज भी हो गया है,मेरी कोई औलाद नही है,बीवी मर गयी है,सिर्फ मैं हूँ और अम्मा..! अम्मा की देखभाल करने वाला कोई नही है इसलिए मुझे हर वक़्त अम्मा का ख्याल रखना पड़ता है
एक दिन मैंने अम्मा का पाँव दबाते हुए बड़ी नरमी से कहा, “अम्मा! तेरी तीमारदारी को तो बड़ा जी चाहता है। पर  जेब खाली है और तू मुझे कमरे से बाहर निकलने नही देती,कहती है तू जाता है तो जी घबराने लगता है,तू ही बता मै क्या करूँ?”
अब क्या गैब से खाना उतरेगा? मैं बनु इस्राईल से हूँ न तू मूसा की माँ है.”
ये सुन कर अम्मा ने हाँफते काँपते उठने की कोशिश की,मैंने तकिये की टेक लगवाई,उन्होंने झुर्रियों वाला चेहरा उठाया अपने कमज़ोर हाथों का प्याला बनाया,और  न जाने अल्लाह से क्या बात की,फिर बोली
तू रेहड़ी वहीं छोड़ आया कर हमारा रिज़्क हमे इसी कमरे में बैठ कर मिलेगा
मैंने कहा अम्मा क्या बात करती हो,वहाँ छोड़ आऊँगा तो कोई चोर उचक्का सब कुछ ले जायेगा, आजकल कौन लिहाज़ करता है? और बिना मालिक के कौन खरीदने आएगा?”
कहने लगीं तू फ़ज़्र की नमाज़ के बाद रेहड़ी को फलों से भरकर छोड़ कर आजा बस,ज्यादा बक बक नही कर,शाम को खाली रेहड़ी ले आया कर, अगर तेरा रुपया गया तो मुझे बोलियो
ढाई साल हो गए है भाई! सुबह रेहड़ी लगा आता हूँ शाम को ले जाता हूँ,लोग पैसे रख जाते है फल ले जाते हैं,एक धेला भी ऊपर नीचे नही होता,बल्कि कुछ तो ज्यादा भी रख जाते है,कभी कोई अम्मा के लिए फूल रख जाता है,कभी कोई और चीज़! परसों एक बच्ची पुलाव बना कर रख गयी साथ मे एक पर्ची भी थी अम्मा के लिए
एक डॉक्टर अपना कार्ड छोड़ गए पीछे लिखा था अम्मा की तबियत नाज़ुक हो तो मुझे काल कर लेना मैं आजाऊँगा,कोई खजूर रख जाता है , रोजाना कुछ न कुछ मेरे रिज़्क के साथ मौजूद होता है।
न अम्मा हिलने देती है न अल्लाह रुकने देता है,अम्मा कहती है तेरा फल अल्लाह फरिश्तों से बिकवा देता है।

(उर्दू से हिंदी तर्जुमा फेसबुक से)

मनुष्य की बुद्धि कितनी है ? चाहेगा कुछ, और माँगेगा कुछ ! अन्त में शिव बनाते-बनाते बन्दर बना बैठेगा ।

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                                                             सुप्रभातम्                                                      🌼    माँ की वाणी    🌼

🍀   मनुष्य की बुद्धि कितनी है ? चाहेगा कुछ, और माँगेगा कुछ ! अन्त में शिव बनातेबनाते बन्दर बना बैठेगा । इसीलिए उनके शरणागत होकर रहना ही ठीक है । जब जिसे जो चाहिए, वे उसे देंगे । फिर भी भक्ति और निर्वासना की कामना करनी चाहिए यह कामना कामना में नहीं आती ।

                                                    🌸    संयम और सिद्धि    🌸

🍀    मिस्र देश के जून्नून नामक एक महात्मा हो गये हैं । उनके पास प्रसिद्ध मुसलमान सन्त यूसुफ हुसैन धर्म की दीक्षा लेने गये । तब महात्मा जून्नून ने उन्हें एक छोटा सा बक्स देते हुए कहा — “मेरा एक मित्र यहाँ से दूर नील नदी के किनारे रहता है; इस बक्स को बड़ी सावधानी से ले जाकर दे आओ, तब आकर दीक्षा लेना ।
           रास्ते में यूसुफ हुसैन ने सोचा कि जब बक्स में ताला नहीं है, तो इसे खोलकर देखा जाय और कौतूहलवश उन्होंने बक्स का ढक्कन खोला, तो उसमें से एक चूहा निकलकर भागा । उस बक्स में चूहे के अतिरिक्त और कुछ न था ।
           अब यूसुफ हुसैन को बड़ा ही पछतावा हुआ कि उन्होंने व्यर्थ ही ढक्कन खोला, किन्तु अब पछताने से कोई लाभ न था, आखिर उन्होंने वह खाली बक्स ही महात्मा जून्नून के सन्त मित्र को दिया  । बक्स खोलने पर जब उस सन्त मित्र को उसमें कुछ भी न दिखाई दिया, तो वे बोले, “महात्मा जून्नून तुम्हें दीक्षा नहीं देंगे, क्यों कि तुममें संयम नहीं है । उन्होंने इस बक्स में जरूर कुछ न कुछ भेजा होगा । सचसच बताओ इसमें उन्होंने कौनसी वस्तू भेजी थी ?” यूसुफ ने सहीसही बात बताकर उनसे माँफी माँगी । उन सन्त मित्र ने महात्मा जून्नून से माफी माँगने के लिए कहा ।
               हताश यूसुफ महात्मा जून्नून के पास लौट आये और उन्होंने सारा वृत्तान्त बताकर उनसे क्षमा माँगी । जून्नून बोले, “यूसुफ, अभी तुम परम ज्ञान के अधिकारी नहीं हो । मैंने तुम्हें एक चूहा सौंपा था, जिसे तुमने गँवा दिया । तब भला धर्मज्ञान जैसी अमूल्य निधि को तुम कैसे सुरक्षित रख पाओगे ? उसके लिए तुम्हें अतीव संयम की जरूरत है । जाओ, अपने चित्त को वश में करने का अभ्यास करो और पुनः आओ, क्यों कि संयम के बिना सिद्धि दुर्लभ है ।
            यूसुफ हुसैन अपने निवासस्थान को वापस लौटे और आत्मसंयम का अभ्यास करने लगे । कई वर्षों के पश्चात् वे पूर्ण विश्वास के साथ पुनः महात्मा जून्नून के पास गये और इस बार उनका मनोरथ सफल हुआ ।

I Never Experienced any Difficulty.

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Maa Sri Sarada Devi Sayings…

Sri Sarada Devi,
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Sri Sarada Devi,
“I would bathe at 4 clocks a.m. As the day advanced, a little sunshine would come near the staircase, and I would dry my hair then. I had very long time hair in those days. One a small room, after all, in the Nahabat! (Near Maa Bhabatarini Kali Temple)”And that too used to be full of things. Many things were even stored in stringed suspenders from the ceiling. 
But I never experienced any difficulty.” 
Shree Maa…

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Om Namah Sri Bhagavate Ramakrishnaya!!!

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Sri Ramakrishna and Vidhyasagar -CONVERSATION

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বিদ্যাসাগর একদৃষ্টে তাকিয়ে আছেন শ্রী শ্রী রামকৃষ্ণ পরমহংসদেবের দিকে‚ পান করছেন তাঁর কথামৃত

রঞ্জন বন্দ্যোপাধ্যায়
নাস্তিক ঈশ্বরচন্দ্র বিদ্যাসাগরের সঙ্গে সাক্ষাৎ হয়েছিল ঠাকুর শ্রী শ্রী রামকৃষ্ণ পরমহংসদেবের | কেমন ছিল দুই কিংবদন্তির সাক্ষাৎ ? জানতে ফিরে যেতে হবে ১৩৩ বছর আগে, সেই মাহেন্দ্রক্ষণে …

১৬ আগস্ট‚ ঠাকুরের প্রয়াণদিবসে দুই মহাপুরুষের সেই সাক্ষাৎ নিয়ে বিশেষ রচনা ১৮৮২ শনিবার তিথি‚ শ্রাবণমাসের কৃষ্ণাষষ্ঠী সময়‚ বিকেল চারটে স্থান‚ কলকাতার বাদুড়বাগান 
ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণ পরমহংস জানেন‚ সাগরদর্শনের এ এক পরমলগ্ন |
এ সাগর যে সে সাগর নয় |
বিদ্যার সাগর |
শ্রীরামকৃষ্ণ একটি ঠিকে গাড়ি ভাড়া করেছেন |
কলকাতার রাজপথ পেরিয়ে তিনি চলেছেন বাদুড়বাগানের দিকে |
তাঁর সমস্ত মন সাগরময় হয়ে আছে |
তিনি অনন্তের চৈতন্যে নিমগ্ন |
দেরি হয়ে যাচ্ছে না তো ? সাগরদর্শনের সঠিক সময় যে বিকেল চারটে !
ঘোড়া আরও জোরে ছুটছে না কেন ?
সাগরদর্শনের পরম লগ্নটি যে দীপ্যমান হয়ে উঠেছে ঠাকুরের ধ্যানের মধ্যে!
শ্রীরামকৃষ্ণের ঠিকে গাড়ি এইমাত্র পেরোচ্ছে আমহার্স্ট স্ট্রিটে রামমোহন রায়ের বাগানবাড়ি | চারটে বাজতে এখনও কয়েক মিনিট বাকি |
গাড়ি ছেড়েছে দক্ষিণেশ্বরের কালীবাড়ি থেকে |
অনেক দূরের পথ |
পোল পার হয়ে‚ শ্যামবাজার পার হয়ে গাড়ি আমহার্স্ট স্ট্রিটে পৌঁছেছে |
ঠাকুরের সঙ্গে রয়েছেন তিন ভক্ত‚ ভবনাথ‚ হাজরা আর মাষ্টার(মহেন্দ্রনাথ গুপ্ত) |
একজন বললেন‚ বাদুড়বাগান এসে গেল বলে |
আর একজন ঠাকুরকে বললেন‚ দেখুন‚ দেখুন‚ রাজা রামমোহনের কত বড় বাগানবাড়ি !
শ্রীরামকৃষ্ণ বেশ বিরক্ত হলেন | বললেন‚ ও সব ভোগবিলাসের কথা ভাল লাগছে না গো |
তিনি ভাবাবিষ্ট হয়ে আছেন সাগরচৈতন্যে |
সাগর তো অনন্ত |
তিনি অনন্তে ডুবে আছেন |
রামমোহনের বাগানবাড়ি দেখার কোনও সাধ নেই তাঁর |
শ্রীরামকৃষ্ণের জন্মভূমি হুগলি জেলার কামারপুকুর গ্রাম |
আর বিদ্যাসাগরের জন্মভূমি বীরসিংহ গ্রাম |
কামারপুকুর থেকে বীরসিংহ খুব দূরের পথ নয় |
সেই কারণেই হয়তো ঈশ্বরচন্দ্র বিদ্যাসাগরকে খুব কাছের মানুষ মনে হয় শ্রীরামকৃষ্ণের |
শুধুই মনে মনে এই নৈকট্য বোধ |
ঠাকুরের মনে ভারী ইচ্ছে‚ বীরসিংহ গ্রামের সিংহটির সঙ্গে একবার অন্তত দেখা করার |
সেই সুযোগ এল‚ যখন মাস্টার বিদ্যাসাগরের স্কুলে মাস্টারি শুরু করলেন |
মাস্টার‘ অর্থাৎ শ্রীশ্রীরামকৃষ্ণকথামৃতের রচয়িতা শ্রী ম |
পুরোনাম‚ মহেন্দ্রনাথ গুপ্ত | ঠাকুরের পরম ভক্ত |
ঠাকুরই মাস্টারকে জিজ্ঞেস করলেন‚ আমাকে বিদ্যাসাগরের কাছে একদিন নিয়ে যাবে ? আহা‚ দক্ষিণেশ্বরের কালীবাড়িতে থাকতেথাকতে বিদ্যে আর দয়ার কথা কত শুনেছি | তিনি বিদ্যেরও সাগর‚ দয়ারও সাগর |
মহেন্দ্র গুপ্ত বিদ্যাসাগরকে বললেন‚ দক্ষিণেশ্বরের শ্রীরামকৃষ্ণ আপনার সঙ্গে একদিন দেখা করতে চান | ভারী ইচ্ছে তাঁর‚ আপনার সঙ্গে আলাপ করার |
বিদ্যাসাগর হেসে বললেন‚ তুমি তো জানো মাস্টার‚ আমি নাস্তিক মানুষ | ঈশ্বর সত্যিই আছেন কি না‚ সেবিষয়ে আমার গভীর সন্দেহ | সত্যি কথা বলতে‚ ভগবানের ব্যাপারে আমার কোনও আগ্রহই নেই | সুতরাং সাধুসন্ন্যাসীদের কাছ থেকেও আমি দূরে থাকি |
মাস্টার বিদ্যাসাগরের কথা শুনে নীরব রইলেন |
ঈশ্বরচন্দ্র বুঝলেন তিনি মহেন্দ্রকে আঘাত করেছেন |
জিজ্ঞেস করলেন‚ বলতো মাস্টার‚ ইনি কীরকম পরমহংস ? তিনি কি গেরুয়া পরা সন্ন্যাসী?
মাস্টার এবার ঈশ্বরচন্দ্র বিদ্যাসাগরের চোখে চোখ রেখে কিঞ্চিৎ দৃঢ় কণ্ঠে বললেন‚ আজ্ঞে না | তিনি এক অদ্ভুত পুরুষ | লালপেড়ে কাপড় পরেন | জামা পরেন | বার্নিশ করা চটি জুতো পরেন |
রাসমণির কালীবাড়িতে একটি ঘরের ভেতর বাস করেন | সেই ঘরে তক্তাপোশ পাতা আছে | তার ওপর বিছানা | মশারিও আছে | সেই বিছানায় তিনি শয়ন করেন | তিনি যে সন্ন্যাসী‚ তার কোনও বাহ্যিক চিহ্ন নেই | তবে ঈশ্বর বই আর কিছু জানেন না | অহর্নিশি তাঁরই চিন্তা করেন |
বিদ্যাসাগর মহেন্দ্রনাথের কথায় হেসে ফেললেন | বললেন‚ বেশ বেশ !তাহলে তাঁকে নিয়ে এসো একদিন |
আপনি কবে যাবেন ? বিদ্যাসাগর আপনার সঙ্গে দেখা করতে চান | ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণকে বললেন মহেন্দ্র |
শ্রীরামকৃষ্ণ নিজের মধ্যে ডুব দিলেন | তাঁর চোখেমুখে ফুটে উঠল দৈব উদ্ভাস |
শ্রীরামকৃষ্ণ মধুর কণ্ঠে বললেন‚ এই শনিবার‚ সেদিন শ্রাবণের কৃষ্ণাষষ্ঠী | সাগরদর্শনের লগ্ন বিকেল চারটে |
বিদ্যাসাগরের বয়েস ঠিক বাষট্টি |
শ্রীরামকৃষ্ণ ষোল বছরের ছোট |
তিনি ছেচল্লিশ |
বিদ্যাসাগরের প্রতি তাঁর হৃদয়ে বড় শ্রদ্ধা আর ভালবাসা |
বিকেল ঠিক চারটে |
শ্রীরামকৃষ্ণের ঠিকে গাড়ি এসে দাঁড়াল বিদ্যাসাগরের বাড়ির সামনে |
ঠাকুর ভাবাবিষ্ট হয়ে আছেন |
মহেন্দ্র বললেন‚ এবার নামতে হবে | আমরা এসে গেছি |
ঠাকুর ধীরে ধীরে গাড়ি থেকে নামলেন | মাস্টার পথ দেখিয়ে বাড়ির মধ্যে নিয়ে যাচ্ছেন |
উঠোনে ফুল গাছ | ঠাকুর মুগ্ধ হয়ে বাড়িটি দেখছেন |
কী সুন্দর বাড়ি !
শান্তির নীড় | সমস্ত বাড়িটি যেন ধ্যানের মন্দির‚ মনে হল শ্রীরামকৃষ্ণের |
তিনি শুনেছেন ঈশ্বরচন্দ্র নাকি ঈশ্বরে বিশ্বাস করেন না !
মৃদু হাসি ফুটে উঠল শ্রীরামকৃষ্ণের মুখে |
চলতেচলতে হঠাৎ তিনি দাঁড়িয়ে গেলেন | মহেন্দ্র জিজ্ঞেস করলেন‚ কী হল‚ থামলেন কেন ?
ঠাকুর নিজের জামার বোতামে হাত দিয়ে দাঁড়িয়ে পড়েছেন |
বালকের সারল্য তাঁর মুখে |
তিনি জিজ্ঞেস করলেন‚ মাস্টার‚ আমার জামার বোতামটা যে খোলা রয়েছে‚ এতে কোনও দোষ হবে না তো ?
শ্রীরামকৃষ্ণের গায়ে একটি লংক্লথের জামা | পরনে লালপেড়ে কাপড় | কাপড়ের কোঁচাটি কাঁধে ফেলা | পায়ে বার্নিশ করা চটিজুতো |
মাস্টার বললেন‚ আপনি খোলা বোতাম নিয়ে ভাববেন না | আপনার বোতাম দেবার দরকার নেই | আপনার কিছুতে দোষ হবে না |
বালককে বুঝালে যেমন নিশ্চিন্ত হয়‚ শ্রীরামকৃষ্ণ পরমহংস তেমনি নিশ্চিন্ত হলেন | তিনি চলতে শুরু করলেন মহেন্দ্রর পিছন পিছন |
ঈশ্বরচন্দ্র বিদ্যাসাগরের বাড়িটি দোতলা | অধিকাংশ বাঙালি বাড়ির মতো নয় | বাড়ি দেখলে ইংরেজের পছন্দ হবে | তবে বাড়তি বিলাসিতার চিহ্নও কোথাও নেই | বাড়িটি দেখলেই মনে হয়‚ বাড়িটি যাঁর‚ তিনি বিলাসবিরোধী | তাঁর আত্ম প্রত্যয় ও সংযম এতই বেশি যে তিনি নিজেকে কোনওভাবে জাহির করতে চান না |
তিনি পছন্দ করেন নিভৃতি |
উপভোগ করেন নির্জনতা |
তিনি কাজের জীবন ও ব্যক্তিগত জীবনকে আলাদা করে রাখতে চান |
তিনি একাকীত্বপ্রিয় |
বিদ্যাসাগরের বাড়ির চারপাশে অনেকখানি খোলা জমি |
জমিটি উঁচু পাঁচিল দিয়ে ঘেরা |
বাড়ির পশ্চিম দিকে সদর দরজা | বেশ বড় গেটওলা বাড়ি |
পশ্চিমদিকের প্রাচীর আর বাড়ির মাঝখানে একটি ফুলের বাগান |
শ্রীরামকৃষ্ণ কিছুক্ষণ তাকিয়ে থাকেন সেই ফুলগুলির দিকে |
বিদ্যাসাগর ফুল ভালবাসেন | শ্রীরামকৃষ্ণ বুঝতে পারেন‚ মানুষটির ওপর যতই কঠিন হোক‚ ভেতরটা নরম |
মাস্টার বলেন‚ এই সিঁড়ি দিয়ে ওপরে আসুন |
পশ্চিম দিকে নীচে একটা ঘর আছে | সেই ঘর থেকে ওপরে যাবার সিঁড়ি |
শ্রীরামকৃষ্ণ প্রথম ধাপটিতে পা রাখলেন |
মহেন্দ্র দেখলেন‚ তাঁর চোখ দুটি এক আশ্চর্য আলোয় ঝলমল করছে |
শ্রীরামকৃষ্ণ জানেন কী হতে চলেছে |
তাঁর তৃতীয় নেত্র দেখতে পাচ্ছে ভবিষ্যৎ !
দোতলায় থাকেন বিদ্যাসাগর |
সিঁড়ি দিয়ে উঠেই উত্তরে একটি কামরা |
তার পুবদিকে হলঘর |
হলঘরের দক্ষিণপুবে বিদ্যাসাগরের শোবার ঘর |
তার দক্ষিণে আরও একটি কামরা | এই কামরাগুলি বহুমূল্য পুস্তকে পরিপূর্ণ্|
দেওয়ালের কাছে সারিসারি অনেকগুলি পুস্তকাধার | তাতে বাঁধানো বইগুলো কী সুন্দরভাবে সাজানো ! একসঙ্গে এত বই !
বালকের মতো অবাক দৃষ্টিতে তাকিয়ে থাকেন শ্রীরামকৃষ্ণ |
এত জেনেও মানুষটি ‘এক‘কে জানেনি !
এক‘কে জানাই তো সব জানা |
তাঁকে না জানলে আর সব জানাই তো বৃথা |
তিনি এগিয়ে চলেন বিদ্যাসাগরের ঘরের দিকে |
হলঘরটার পুবদিকে একেবারে শেষে একটি টেবিল ও চেয়ার |
বিদ্যাসাগর যখন কাজ করেন তখন এখানে তিনি পশ্চিমাস্য হয়ে বসেন |
টেবিলের চারধারে চেয়ার |
যাঁরা কাজের সময় তাঁর সঙ্গে দেখা করতে আসেন‚ তাঁরা সেই চেয়ারে বসেন | বিদ্যাসাগরের টেবিলে লেখাপড়ার অনেক সামগ্রী — কাগজ‚ কলম‚ দোয়াত‚ কালি‚ ব্লটিংপেপার‚ হিসাবপত্রের বাঁধানো খাতা‚ দু‘চারখানি বিদ্যাসাগরপ্রণীত পাঠ্যপুস্তকও আছে |
এই কাজের ঘরের ঠিক দক্ষিণে‚ বিদ্যাসাগরের কাঠের চেয়ারটির ঠিক পাশেই বলা যায়‚ তাঁর বিছানা | কাজের শেষে তাঁর বিশ্রাম ও নিদ্রার জায়গা |
একটি জরুরি কথা বলবার জন্যে আলাদা রেখেছি |
বিদ্যাসাগরের টেবিলে অন্যান্য জিনিসের মধ্যে ছড়ানো আছে অনেক চিঠিপত্রও | চিঠিগুলির দিকে এবার একটু দৃষ্টি দেওয়া যাক —
কোনও বিধবা লিখেছে‚ আমার অপোগণ্ড শিশু অনাথ‚ দেখবার কেউ নেই‚ আপনাকে দেখতে হবে |
আর একজন লিখছে‚ আপনি কার্মাটার চলে গিয়েছিলেন‚ তাই আমরা মাসোহারা ঠিক সময়ে পাইনি | বড় কষ্ট হচ্ছে |
এক গরিব ছাত্র লিখছে‚ আপনার স্কুলে ফ্রি ভর্তি হয়েছি‚ কিন্তু আমার বই কেনবার ক্ষমতা নেই |
কেউ বা লিখেছে‚ আমার পরিবারবর্গ খেতে পাচ্ছে না‚ আমাকে একটা চাকরি করে দিতে হবে |
বিদ্যাসাগরের স্কুলের এক শিক্ষকের চিঠিও আছে —
আমার ভগিনী বিধবা হয়েছে‚ তার সমস্ত ভার আমাকে নিতে হয়েছে | এ বেতনে আমার চলে না |
কেউ লিখছেন‚ অমুক তারিখে সালিসির দিন নির্ধারিত | আপনি সেদিন এসে আমাদের বিবাদ মিটিয়ে দিন |
একটি ইংরেজি চিঠি এসেছে বিলেত থেকে | নির্ভুল‚ সুঠাম ইংরেজিতে পত্রদাতার বক্তব্য –
আমি এই প্রবাসে বিপদগ্রস্ত‚ ঋণে আকণ্ঠ ডুবে আছি‚ উপবাসে কাটছে‚ আপনি দীনের বন্ধু‚ দয়ার সাগর‚ কিছু টাকা পাঠিয়ে বিপদ থেকে আমাকে রক্ষা করুন |
করুণাময় বিদ্যাসাগরের হৃদয় কাঁদে সকলের জন্য | কাউকে তিনি ‘না‘বলতে পারেন না |
সাহায্যপ্রার্থীর কাছ থেকে দূরে সরে যেতে পারেন না কখনও |
শ্রীরামকৃষ্ণের মনে একটি প্রশ্ন — প্রথম দেখা হওয়ার সময় বিদ্যাসাগর দক্ষিণমুখী হয়ে বসবে তো ?
সিঁড়ি দিয়ে উপরে উঠে এলেন শ্রীরামকৃষ্ণ |
উঠে এসেই প্রবেশ করলেন উত্তরের ঘরটিতে | ভক্তেরাও এল সঙ্গে |
ঠাকুর দেখলেন‚ বিদ্যাসাগর আজ দক্ষিণাস্য হয়েই বসে আছেন !
ঠাকুর একবার শুধু বললেন‚ জয় মা !
বিদ্যাসাগর ঘরের উত্তর কোণে দক্ষিণমুখী |
তাঁর সামনে পালিশ করা চারকোণা লম্বা টেবিল |
টেবিলের পুব দিকে একখানি বেঞ্চ |
দক্ষিণে ও পশ্চিমে কয়েকটি চেয়ার |
বিদ্যাসাগর কাজ করছেন না‚ তাই তিনি পশ্চিমাস্য নন | তিনি শ্রীরামকৃষ্ণের জন্য অপেক্ষা করছেন আর দক্ষিণাস্য হয়ে দুএকটি বন্ধুর সঙ্গে কথা বলছেন |
ঠাকুর প্রবেশ করতেই বিদ্যাসাগর দাঁড়িয়ে উঠে তাঁকে অভ্যর্থনা করলেন |
ঠাকুর একদৃষ্টে বিদ্যাসাগরের দিকে তাকিয়ে | তাঁরা যেন পূর্বপরিচিত |
ঠাকুরের মুখে মধুর হাসি |
বিদ্যাসাগর চুপ করে দাঁড়িয়ে |
তাঁর পরনে থান কাপড় | পায়ে চটিজুতো | গায়ে একটি হাতকাটা ফ্লানেলের ফতুয়া | মাথার চারপাশ কামানো |
তিনি একটু হাসলেন | দাঁতগুলি উজ্জ্বল |
সমস্তই বাঁধানো দাঁত |
বিদ্যাসাগরের মাথাটি অস্বাভাবিক বড় | উন্নত ললাট |
বিদ্যাসাগর বেশ বেঁটে |
গলায় মোটা উপবীত‚ ফতুয়ার পাশ থেকে বেড়িয়ে আছে |
শ্রীরামকৃষ্ণ ভাবাবিষ্ট | তিনি একইভাবে দাঁড়িয়ে আছেন | আর ভাব সংবরণ করবার জন্যে মধ্যে মধ্যে বলছেন‚ জল খাবো | দেখতেদেখতে বাড়ির ছেলেরা ও আত্মীয় বন্ধুরা এসে দাঁড়ালেন |
ঠাকুর ভাবাবিষ্ট হয়ে বেঞ্চে বসে পড়লেন |
আর সঙ্গে সঙ্গে তাঁর শরীরে জ্বালা ধরল |
একটি সতেরোআঠেরো বছরের ছেলে সেই বেঞ্চিতে বসে আছে | বিদ্যাসাগরের কাছে পড়াশোনার সাহায্য প্রার্থনা করতে এসেছে ছেলেটি |
ঠাকুর ভাবাবিষ্ট | ঋষির অন্তর্দৃষ্টি তাঁর | ছেলেটির অন্তরের ভাব তিনি বুঝে ফেলেছেন | তাই তাঁর শরীরে জ্বালা |
ঠাকুর ছেলেটির কাছ থেকে দূরে সরে গেলেন | বললেন‚ মা‚ এ ছেলের বড় লোভ | সংসার ছাড়া কিছু বোঝে না | মা গো‚ তোমার অবিদ্যার সংসার !এ অবিদ্যার ছেলে !
যে ব্যক্তি ব্রহ্মবিদ্যার জন্য ব্যাকুল নয়‚ শুধু চায় অর্থকরী বিদ্যা‚ ঠাকুর তাকেই বলছেন অবিদ্যার সংসারে অবিদ্যার ছেলে !
বিদ্যাসাগর ধাক্কা খেলেন | এক ধাক্কাতেই চিড় ধরল তাঁর প্রত্যয়ে |
তিনি নিজেও তো ব্রহ্মবিদ্যার কথা ভাবেন না কখনও !
বিদ্যাসাগর ব্যস্ত হয়ে একজনকে জল আনতে বললেন |
তারপর মহেন্দ্রকে জিজ্ঞেস করলেন‚ মাস্টার‚ কিছু খাবার আনালে ইনি খাবেন কি ?
মহেন্দ্র বললেন‚ আজ্ঞে‚ আনুন না |
বিদ্যাসাগর নিজেই ভিতরে গিয়ে কতকগুলি মিঠাই আনলেন | বললেন‚ এগুলি বর্ধমান থেকে এসেছে |
ঠাকুর কিছু খেলেন | হাজরা‚ ভবনাথও কিছু পেলেন |
বিদ্যাসাগর মহেন্দ্রর দিকে তাকিয়ে বললেন‚ তুমি তো ঘরের ছেলে |
ঠাকুর মিষ্টিমুখ করছেন আর বালকের মতো হাসছেন | দেখতেদেখতে একঘর লোক হয়ে গেল | কেউ বসে | কেউ দাঁড়িয়ে |
ঠাকুর এতক্ষণ বিশেষ কথা বলেননি | এবার একঘর লোকের সামনে বিদ্যাসাগরের দিকে তাকিয়ে বললেন‚ আজ সাগরে এসে মিললাম | এতদিন খাল – বিল – হদ্দনদী দেখেছি | এইবার সাগর দেখছি |
ঠাকুরের এই প্রাণখোলা বুদ্ধিদীপ্ত রসিকতায় সবাই হাসতে আরম্ভ করল |
বিদ্যাসাগরও কম যান না | তিনি সহাস্যে বললেন‚ তবে নোনা জল খানিকটা নিয়ে যান |
ঠাকুর সঙ্গে সঙ্গে বললেন‚ না গো ! নোনা জল কেন ? তুমি তো অবিদ্যার সাগর নও | বিদ্যার সাগর | তুমি ক্ষীরসমুদ্র | ঘরের সকলে হেসে উঠলেন |
বিদ্যাসাগর দেখলেন ঠাকুরের সঙ্গে কথায় পারবেন না | শুধু বললেন‚ ক্ষীরসমুদ্র ! তা বলতে পারেন বটে !
বিদ্যাসাগর চুপ | কথা বলছেন শ্রীরামকৃষ্ণ | বিদ্যাসাগর শুনছেন |
মাঝে মধ্যে প্রশ্ন করছেন আগ্রহী ছাত্রের মতো |
ঠাকুর একেবারেই লেখাপড়া জানেন না | নিজের নামটিও সই করতে পারেন না |
তবু ঠাকুর বলছেন | আর শুনছেন ঈশ্বরচন্দ্র বিদ্যাসাগর !
বিদ্যাসাগরের মনে হচ্ছে‚ বেদান্ত উচ্চারিত হচ্ছে ঠাকুরের কণ্ঠে !
অথচ কী সহজ সরল শ্রীরামকৃষ্ণের মুখের ভাষা !
শ্রীরামকৃষ্ণ বললেন‚ তোমার কর্ম সাত্ত্বিক কর্ম | সত্ত্বগুণ থেকে দয়া হয় | দয়ার জন্য যে কর্ম করা যায়‚ সে রাজসিক কর্ম বটে‚ কিন্তু এ রজোগুণ সত্ত্বের রজোগুণ‚ এতে দোষ নেই | শুকদেবাদি লোকশিক্ষার জন্যে দয়া রেখেছিলেন | ঈশ্বরবিষয় শিক্ষা দেবার জন্যে | তুমি বিদ্যাদান‚ অন্নদান করছ‚ এও ভাল | নিষ্কাম করতে পারলেই এতে ভগবান লাভ হয় | কেউ কেউ করে নামের জন্যে‚ কেউ করে পুণ্যের জন্যে | তাদের কর্ম নিষ্কাম নয় | আর সিদ্ধ তো তুমি আছোই |
বিদ্যাসাগর শ্রীরামকৃষ্ণের শেষ কথাটার অর্থ ঠিক ঠাওর করতে পারলেন না | জিজ্ঞেস করলেন‚ আমি সিদ্ধ ! কেমন করে ?
শ্রীরামকৃষ্ণ ভারি মিঠে করে উত্তর দিলেন‚ আলু পটল সিদ্ধ হলে তো নরম হয় | তা তুমি তো খুব নরম | তোমার অত দয়া !
সকলে হেসে উঠলেন |
বিদ্যাসাগর রসিক মানুষ | মুহূর্তে বললেন‚ কলাইবাটা সিদ্ধ তো শক্তই হয় |
আবার সকলের হাসি |
এবার ঠাকুর কী বলবেন ?
ঠাকুর বললেন‚ তুমি তা নও গো | ‘শুধু‘ পণ্ডিতগুলো দরকচাপড়া | তুমি তো শুধু পণ্ডিত নও | তুমি বিদ্যার সমুদ্র | শুধু পণ্ডিতগুলোর না এদিক‚ না ওদিক | শকুনি খুব উঁচুতে ওঠে | কিন্তু নজর ভাগাড়ে | যারা শুধু পণ্ডিত‚ শুনতেই পন্ডিত | কিন্তু তাদের কামিনীকাঞ্চনে আসক্তি — শকুনের মতো পচামড়া খুঁজছে |
আসক্তি অবিদ্যার সংসারে | দয়া‚ ভক্তি‚ বৈরাগ্য বিদ্যার ঐশ্বর্য |
বিদ্যাসাগর নীরব | তিনি একদৃষ্টে তাকিয়ে আছেন এক আনন্দময় পুরুষের দিকে | পান করছেন তাঁর কথামৃত |
বিদ্যাসাগর মহাপণ্ডিত |
তিনি ষড়দর্শন পাঠ করেছেন |
জানতে চেয়েছেন ঈশ্বরকে | আর এইটুকু বুঝতে পেরেছেন যে‚ ঈশ্বরের বিষয়ে কিছুই জানা যায় না |
শ্রীরামকৃষ্ণ তাকালেন বিদ্যাসাগরের দিকে | যেন বুঝতে পারলেন বিদ্যাসাগরের মনের কথা | বললেন‚ ব্রহ্মবিদ্যা ও অবিদ্যার পার | তিনি মায়াতীত |
মহাপণ্ডিত বিদ্যাসাগর শুনছেন মুগ্ধ বিস্ময়ে |
বলে চলেছেন শ্রীরামকৃষ্ণ —
এই জগতে বিদ্যামায়াঅবিদ্যামায়া দুই আছে | জ্ঞানভক্তি আছে | আবার কামিনীকাঞ্চনও আছে | সৎও আছে | আবার অসৎও আছে | ভাল আছে | আবার মন্দও আছে | কিন্তু ব্রহ্ম নির্লিপ্ত | ভালমন্দ জীবের পক্ষে | সৎঅসৎ জীবের পক্ষে | ব্রহ্মের ওতে কিছু হয় না |
বিদ্যাসাগর বললেন‚ একটু ব্যাখ্যা করে‚ আরও সহজ করে বুঝিয়ে দিন |
শ্রীরামকৃষ্ণ সহজ সরল হাসি হেসে বললেন‚ প্রদীপ যেমন নির্লিপ্ত‚ ব্রহ্মও সেইরকম | প্রদীপের সামনে কেউ ভাগবত পড়ছে আর কেউ বা জাল করছে | প্রদীপের তাতে কিছু যায় আসে না | কোনও কাজটির সঙ্গেই প্রদীপ যুক্ত হচ্ছে না | সে নির্লিপ্তভাবে শুধু জ্বলছে | যদি বলো দুঃখ‚ পাপ‚ অশান্তি এ সকল তবে কী ? তার উত্তর এই যে ওসব জীবের পক্ষে | ব্রহ্ম নির্লিপ্ত | যেমন ধরো সাপের মধ্যে বিষ আছে | অন্যকে কামড়ালে মরে যায় | সাপের কিন্তু কিছু হয় না |
বিদ্যাসাগরের মুখে রা নেই | তিনি ক্রমে বুঝতে পারছেন‚ এক নিরক্ষর ব্রাহ্মণের মুখে বেদান্ত কী সহজ সরল ভাষায় উচ্চারিত হচ্ছে !
শ্রীরামকৃষ্ণ বললেন‚ ব্রহ্ম যে কী মুখে বলা যায় না |
সব জিনিস উচ্ছিষ্ট হয়ে গেছে |
বেদ‚ পুরাণ‚ তন্ত্র‚ ষড়দর্শন‚ সব এঁটো |
থামলেন শ্রীরামকৃষ্ণ | তাকালেন বিদ্যাসাগরের মুখের দিকে |
বিস্মিত বিদ্যাসাগর প্রশ্ন করলেন‚ এঁটো কেন ?
শ্রীরামকৃষ্ণ হেসে উত্তর দিলেন‚ মুখে পড়া হয়েছে‚ মুখে উচ্চারণ হয়েছে‚ তাই এঁটো হয়ে গেছে |
কিন্তু একটি জিনিস কেবল উচ্ছিষ্ট হয়নি গো !
সেই জিনিসটি ব্রহ্ম |
ব্রহ্ম যে কী‚ আজ পর্যন্ত কেউ মুখে বলতে পারেনি |
বিদ্যাসাগরের বুকের ভেতরটা তোলপাড় করে উঠল |
আবেগে কাঁপছে তাঁর শরীর |
শ্রীরামকৃষ্ণ বয়েসে অনেক ছোট‚ তবু বিদ্যাসাগরের ইচ্ছে হল তাঁর কাছে নতজানু হওয়ার |
তিনি শুধু কম্পিত কণ্ঠে বললেন‚ আজ একটি নতুন কথা শিখলাম |
ব্রহ্ম উচ্ছিষ্ট হননি !
ঘরে তখন অনেক মানুষের ভিড় হয়ে গেছে |
সবাই শুনছে ঠাকুরের কথা |
কী সহজ‚ কী প্রাণস্পর্শী‚ কী গভীর !
ঠাকুর কী অনায়াসে আড়াল সরিয়ে দিচ্ছেন !
ফুটে উঠছে নতুন আলো |
জাগ্রত হচ্ছে নব চেতনা |
উদ্ঘাটিত হচ্ছে সত্যের মুখ |
শ্রীরামকৃষ্ণ বললেন‚ এবার একটা গল্প বলছি‚ শোনো |
এক বাপের দুটি ছেলে |
ব্রহ্মবিদ্যা শেখবার জন্যে ছেলে দুটোকে বাপ আচার্যের হাতে দিলেন |
কয়েক বছর পরে তারা গুরুগৃহ থেকে ফিরে এল |
এসে বাপকে প্রণাম করলে |
বাপের এবার ইচ্ছে হল‚ এদের ব্রহ্মজ্ঞান কেমন হয়েছে একটু বাজিয়ে দেখবার |
বড় ছেলেকে জিগ্যেস করলেন‚ বাপ ! তুমি তো সব পড়েছো | ব্রহ্ম কীরূপ বলো দেখি |
বড় ছেলেটি বেদ থেকে নানা শ্লোক বলে বলে ব্রহ্মের স্বরূপ বোঝাতে লাগল |
বাপ শুনলেন | কোনও কথা বললেন না | বড় ছেলে বাপের মনের ভাব বুঝতে পারল না |
এবার ছোট ছেলেকে বললেন‚ তুমি বলো দেখি ব্রহ্মের কী রূপ ?
ছোট ছেলের মুখে কোনও কথা নেই |
সে হেঁট মুখে নীরবে দাঁড়িয়ে থাকল |
বাপ প্রসন্ন হয়ে ছোট ছেলেকে বললেন‚ বাপু‚ তুমি একটু বুঝেছো | ব্রহ্ম যে কী তা মুখে বলা যায় না |
শ্রীরামকৃষ্ণ কিছুক্ষণ থামলেন | তিনি জানেন‚ সাধারণ মানুষকে তাঁর কথার মর্ম বুঝতে একটু সময় দিতে হয় |
তারপর তাঁর গল্পের সূত্রটি ধরেই বললেন‚ মানুষ মনে করে আমরা তাঁকে জেনে ফেলেছি |
কিন্তু সত্যি কি জানা যায় ?
জানা গেলেও কতটুকুই বা জানা যায় তাঁকে ?
বিদ্যাসাগর নিবিষ্ট হয়ে শুনছেন | আর অপলক তাকিয়ে আছেন শ্রীরামকৃষ্ণের দিকে | আর কারও কথা শুনে কখনও এমন ঘোর লাগেনি তাঁর |
শ্রীরামকৃষ্ণ বিদ্যাসাগরের মুখের দিকে তাকিয়েই বললেন‚ আর একটা গল্প বলছি শোনো |
একটা পিঁপড়ে চিনির পাহাড়ে গিছলো |
এক দানা খেয়ে পেট ভরে গেল | আর এক দানা মুখে করে সে বাসার পথে চলেছে |
যাবার সময় ভাবল‚ এবার এসে সব পাহাড়টা নিয়ে যাব |
ক্ষুদ্র জীবেরা এইসব মনে করে |
জানে না ব্রহ্ম বাক্যমনের অতীত !
যে যতই বড় হোক না কেন‚ তাঁকে জানা যায় না |
বিদ্যাসাগর হঠাৎ বলে ফেললেন‚ কেন শুকদেব ? তিনি তো …
শ্রীরামকৃষ্ণ হেসে বললেন‚ শুকদেবাদি না হয় ডেঁও পিঁপড়ে |
চিনির আটনটা দানা না হয় মুখে করেছে | তার বেশি নয় |
ঘরে এত মানুষ | তবু পিন পড়লে শব্দ পাওয়া যাবে |
রোজ কত পণ্ডিত মানুষের আসাযাওয়া বিদ্যাসাগরের বাড়িতে |
কিন্তু এমন জীবন্ত বেদান্ত কখনও দেখিনি ! শ্রীরামকৃষ্ণের কথা শুনছেন আর ভাবছেন বিদ্যাসাগর |
শ্রীরামকৃষ্ণ বলতে লাগলেন‚ তবে বেদে পুরাণে যা বলেছে‚ সে কী রকম বলা জানো ?
বিদ্যাসাগর বুঝলেন‚ ঘরের মধ্যে আর কেউ না বুঝুক তিনি অন্তত ধারণা করতে পারলেন‚ শ্রীরামকৃষ্ণের কণ্ঠে নতুনভাবে ব্যাখ্যাত হতে চলেছে বেদ ও পুরাণ !
তিনি উদগ্রীব হয়ে শুনছেন |
ঠাকুর বললেন‚ একজন সাগর দেখে এলে কেউ যদি জিগ্যেস করে‚ কেমন দেখলে‚ সে লোক মুখ হাঁ করে বলে‚ — ও ! কী দেখলুম ! কী হিল্লোল‚ কল্লোল |
ব্রহ্মের কথাও সেই রকম | বেদে আছে তিনি আনন্দস্বরূপ | সচ্চিদানন্দ |
বিস্মিত বিদ্যাসাগর | শ্রীরামকৃষ্ণ বেদ পড়েছেন!
তিনি তো নিরক্ষর |
বিদ্যাসাগর কী ভাবছেন‚ শ্রীরামকৃষ্ণ যেন বুঝতে পারলেন |
বললেন‚ শুকদেবাদি এই ব্রহ্মসাগরতটে দাঁড়িয়ে দর্শন স্পর্শন করেছিলেন মাত্র |
তাঁরা কিন্তু ব্রহ্মসাগরে নামেননি | এ সাগরে নামলে আর ফেরবার জো নেই গো |
ঠাকুরের কথায় চমকে উঠলেন বিদ্যাসাগর | এতো একেবারে নতুন কথা |
অথচ কী অবলীলায় কথাটি বললেন পরমহংস !
বিদ্যাসাগর প্রশ্ন করলেন তাহলে ব্রহ্মাণ্ডজ্ঞান হওয়ার উপায় ? ঠাকুর উত্তর দিলেন‚ সমাধিস্থ হলে ব্রহ্মজ্ঞান হয় |
সেই অবস্থায় বিচার একেবারে বন্ধ হয়ে যায় |
মানুষ চুপ হয়ে যায় |
ব্রহ্ম কী বস্তু‚ মুখে বলবার শক্তি থাকে না | শ্রীরামকৃষ্ণ আর একটা গল্প বললেন—
নুনের পুতুল সমুদ্র মাপতে গিছলো | কত গভীর জল সেই খবরটা সে দিয়ে চেয়েছিল | কিন্তু খবর দেওয়া আর হল না | যেই নামল জলে অমনি গেল গলে | কে আর খবর দেবে ? একজন প্রশ্ন করলেন‚ সমাধিস্থ ব্যক্তি যাঁর ব্রহ্মজ্ঞান হয়েছে তিনি কী আর কথা কন না ?
বিদ্যাসাগরকে চমকে দিল ঠাকুরের বিদ্যুতের মতো উত্তর
শঙ্করাচার্য লোকশিক্ষার জন্য বিদ্যার ‘আমি’ রেখেছিলেন | বিদ্যাসাগর এই কথার গভীর অর্থটুকু বুঝতে পারলেন | আপাত অশিক্ষিত একটি মানুষের জ্ঞানের ব্যাপ্তি ও গভীরতা দেখে তিনি স্তম্ভিত !
শ্রীরামকৃষ্ণ এবার আরও সহজ করে তাঁর বক্তব্যের সারাৎসার তুলে ধরলেন—
ব্রহ্মদর্শন হলে মানুষ চুপ হয়ে যায় | যতক্ষণ দর্শন না হয়‚ ততক্ষণই বিচার তেমনি সমাধিত পুরুষ—লোকশিক্ষা দেবার জন্য আবার নেমে আসে আবার কথা কয় |
বিদ্যাসাগরের চোখে একইসঙ্গে ফুটে ওঠে মুগ্ধতা আর শ্রদ্ধা 
তাঁর মন বলে ওঠে ‚ শ্রীরামকৃষ্ণ পরমহংস সেই পুরুষ তো তুমি নিজে | সমাধিস্থ হয়েও লোকশিক্ষার জন নেমে এসেছো‚ কথা বলছো !
শ্রীরামকৃষ্ণ এবার ব্রহ্মজ্ঞানীর স্বরূপ অন্যভাবে ফুটিয়ে তোলেন্—
যতক্ষণ মৌমাছি ফুলে না বসে ততক্ষণ ভনভন করে‚ ফুলে বসে মধুপান করতে আরম্ভ করলে চুপ হয়ে যায় | মধুপান করে মাতাল হবার পরে আবার কখনওকখনও গুনগুন করে |পুকুরে কলসিতে জল ভরার সময় ভকভক শব্দ হয় | পূর্ণ হয়ে গেলে আর শব্দ নেই | তবে আর এক কলসিতে যদি ঢালাঢালি হয় তাহলে আবার শব্দ হয় |
একজন হঠাৎ বললেন‚ঋষিদের কি ব্রহ্মজ্ঞান হয়েছিল ?
শ্রীরামকৃষ্ণ উত্তর দিলেন‚ হ্যাঁ হয়েছিল | বিষয়বুদ্ধির লেশমাত্র থাকলে এই ব্রহ্মজ্ঞান হয় না | ঋষিরা দেখাশোনাছোঁয়া এসবের বিষয় থেকে মনকে আলাদা রাখত | সমস্ত দিন ধ্যান করে কাটত | তবে ব্রহ্মকে বোধে বোধ করত | এবার সরাসরি বিদ্যাসাগরের দিকে তাকালেন ঠাকুর | বললেন‚ কলিতে অন্নগত প্রাণ | দেহ বৃদ্ধি যায় না | যারা বিষয় ত্যাগ করতে পারে না‚ তাদের ‘আমি’ কোনওভাবে যায় না |
তাদের বরং ‘আমি ব্রহ্ম’ না বলে বলা উচিত আমি ভক্ত‚ আমি দাস এ অভিমান ভাল |
ভক্তিপথে থাকলেও তাঁকে পাওয়া যায়  বিদ্যাসাগরকে যেন সরাসরি বলছেন ঠাকুর—জ্ঞানীর পথও পথ  আবার জ্ঞানভক্তির পথও পথ | আবার ভক্তির পথও পথ |
জ্ঞানযোগও সত্য | ভক্তির পথও সত্য | সব পথ দিয়েই তাঁর কাছে যাওয়া যায় |কিন্তু যতক্ষণ তিনি ‘আমি’ রেখেছেন আমাদের মধ্যে ততক্ষণ ভক্তিপথই সোজা |
শ্রীরামকৃষ্ণ এবার যেন শুধু বিদ্যাসাগরকেই দেখছেন | তিনি এই মহাপণ্ডিতকে বললেন‚ বিজ্ঞানী কী বলে ? বিজ্ঞানী বলে‚ যিনি ব্রহ্ম‚ তিনিই ভগবান |অর্থ বুঝিয়ে দিচ্ছি |ব্রহ্ম নির্গুণ | তিনি গুণাতীত | ভগবান ষড়ৈশ্বর্যপূর্ণ |এই জীবজগৎ‚ মন বুদ্ধি‚ বৈরাগ্য‚ জ্ঞান‚ এসব তাঁর ঐশ্বর্য |
দেখো না এই জগৎ কী চমৎকার | কত রকম জিনিস‚ চন্দ্র‚ সূর্য‚ নক্ষত্র | কত রকম জীব | বড় ছোট ভালমন্দ কারু বেশি শক্তি‚ কারু কম শক্তি | ব্রহ্মই ভগবান হয়েছেন 

श्रीरामकृष्ण देव — गुरु की बातों पर विश्वाश करना । उनके आदेश के अनुसार चलने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते है । जैसे डोर अगर ठिकाने लगी हुई हो तो उसे पकड़कर चलने से पते पर पहुंचा जा सकता है ।

 🌹 श्रीरामकृष्ण वचनामृत 🌹
🍀🍁🍀 प्रथम भाग 🍀🍁🍀
🌹 परिच्छेद 90  पृष्ट संख्या 605 🌹
🌼 साधक — महाराज , उपाय क्या है ?
🍁 श्रीरामकृष्ण देव — गुरु की बातों पर विश्वाश करना । उनके आदेश के अनुसार चलने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते है । जैसे डोर अगर ठिकाने लगी हुई हो तो उसे पकड़कर चलने से पते पर पहुंचा जा सकता है ।
🌼 साधक — क्या उनके दर्शन हो सकते है ?
🍁 श्रीरामकृष्ण देव — वे विषय – बुद्धि के रहते नही मिलते । कामिनी और कांचन का लेश मात्र रहते उनके दर्शन नही हो सकते । वे शुद्ध मन  और शुद्ध बुद्धि से गोचर होते है । वह मन चाहिए जिसमे आसक्ति का लेशमात्र न हो । शुद्ध – मन , शुद्ध – बुद्धि और शुद्ध आत्मा , ये एक ही वस्तु है ।
🍁🍀🍁
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