एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते।

एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते।
एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। 

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एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। 

साधु महाराज का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले “आइए हनुमंत जी बिराजिए” कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे।
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एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई । उन्हें लगा कि महाराज रोज “आइए हनुमंत जी बिराजिए” कहते हैं तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे !

अत: वकील साहब ने महात्मा जी से पूछ ही डाला- महाराज जी आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उसपर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं ?
साधु महाराज ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं । वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी, हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए । आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं ।
महाराज जी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है । आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ या आप कथा में आना छोड़ दो।
लेकिन वकील नहीं माना । कहता ही रहा कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं । यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे, इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं।
इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा । मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया । हारकर साधु महाराज ने कहा…  हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा । कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा।
जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना, कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा ।
मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाएंगे फिर आप गद्दी ऊँची उठाना । यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं । वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया ।
महाराज ने कहा… हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ? यह तो सत्य की परीक्षा है । वकील ने कहा- मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा । आप पराजित हो गए तो क्या करोगे ? साधु ने कहा… मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा।
अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे, वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए। काफी भीड़ हो गई। पंडाल भर गया । श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था।
साधु महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे । गद्दी रखी गई ।
महात्मा जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले… “आइए हनुमंत जी बिराजिए” ऐसा बोलते ही साधु महाराज के नेत्र सजल हो उठे । मन ही मन साधु बोले… प्रभु ! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है । मैं तो एक साधारण जन हूँ । मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना ।
फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया आइए गद्दी ऊँची कीजिए । लोगों की आँखे जम गईं । वकील साहब खड़ेे हुए ।
उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके ! जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे।
महात्मा जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके । तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए। वकील साहब साधु महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है ।
अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं। कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है । मानो तो देव नहीं तो पत्थर ।
प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है तो प्रभु बिराजते है ।
जय श्री बजरंग बली….
जय श्री राम……

শ্রীরামকৃষ্ণ ও সারদাদেবীর আত্মীয়া এবং দক্ষিণেশ্বরে তাঁদেরই স্নেহে পরিপালিতা ভবতারিনী দেবী II শাঁকচুন্নী কী কালো রে

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Swami Vivekananda
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Swami Vivekananda

শাঁকচুন্নী কী কালো রে

“স্বামীজী, আমার পিছনে খুব লাগতেন”। স্বামীজীর সম্বন্ধে শৈশবের স্মৃতিচারণা করছেন শ্রীরামকৃষ্ণের অন্যতম গৃহীভক্ত এবং স্বামীজীর বিশেষ অনুরাগী বসুমতী সাহিত্য মন্দিরের প্রতিষ্ঠাতা ও স্বত্বাধিকারী সুপুরুষ উপেন্দ্রনাথ মুখোপাধ্যায়ের সহধর্মিণী। শ্রীরামকৃষ্ণ ও সারদাদেবীর আত্মীয়া এবং দক্ষিণেশ্বরে তাঁদেরই স্নেহে পরিপালিতা ভবতারিনী দেবী।
“আমাকে স্বামীজী শাঁকচুন্নী বলে খেপাতেন। খুব কালো ছিলাম দেখতে। কুচকুচে কালো। ভাতের হাঁড়ির কালিকেও হার মানাত। কিন্তু তিনি যখন ‘কালো’ বলে খেপাতেন তখন ভীষণ রেগে যেতাম। তিনি এসেছেন শুনলে লুকিয়ে পড়তাম। কিন্তু ঠিক খুঁজে বের করতেন। আর নিজেই হাসতেন। আবার ভালওবাসতেন খুব। আমাকে কাছে ডেকে হাত ভর্তি করে জামরুল, পেয়ারা, কালোজাম দিতেন।

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কি তার ভালবাসা! এখন যখন ভাবি, চোখ জলে ভরে যায়।
এক গ্লাস জল আমার হাতে তাঁর চাই-ই-চাই। আবার খেপানোর জন্য বলতেন, ‘তোর এই কালো হাতে জল খেতে আমার ঘেন্না করে’। সেজন্য জল চাইলে আমি দিতাম না। কিন্তু সে কথা শোনে কে! বলতেন, ‘দ্যাখ শাঁকচুন্নী, সাধুকে সেবা কর। সাধুকে জল খাওয়ালে গায়ের রঙ ফর্সা হয়। খাইয়ে দ্যাখ, তুই আমার মত ফর্সা হয়ে যাবি। ফর্সা যদি নাও হোস তবে ফুটফুটে শিবের মত বর নিশ্চয়ই পাবি। নে, এখন জল খাওয়া, পারিস তো এক ছিলিম তামাক খাওয়া’।
শেষ পর্যন্ত জল এনে দিতাম।
বিয়ের পরে যখন আমায় স্বামী বলছেন, ‘নরেন এসেছে, সুপারি কেটে দাও’।
আমি বলেছিলাম, ‘আমি পারব না। ও আমায় কালো মেয়ে বলেছে’। ছোট্ট মেয়ে। দুষ্টু মন। ‘ওই যে কালো মেয়ে’ বলেছে, সে কথাটা ঠিক মনে ছিল!
বিদেশ থেকে ফিরে এলেন স্বামীজী। বিশ্ববিখ্যাত বিবেকানন্দ কিন্তু তখনো সেই নরেনই ছিলেন।

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হঠাৎই একদিন আমাদের কাশীর বাড়ীতে এসে হাজির। সবাই তো একেবারে থ! সূর্যের মতো দেখতে, যেন আগুন জ্বলছে! যারা তাঁর সঙ্গে এসেছিল, তাদেরকে বললেন, ‘তোমরা সব যাও। আমি আজ এখানে থাকব’। সবাই চলে গেল।
বললেন, ‘কই রে শাঁকচুন্নী!’ খুব জোরে জোরে কথা বলতেন। ‘আমাকে অভ্যর্থনা করলিনি!’ আমি তো কেঁদে ফেলেছি। পুরনো কথা মনে পড়ে গেল।
আমাকে কাঁদতে দেখে আমার দুখানা হাত জড়িয়ে ধরে বললেন, ‘আমি আজ এলাম, আর তুই এখন কাঁদবি! তবে আমি যাই। এখানে এলাম দুটো প্রান খুলে কথা বলব; আগের মত করে হাসব। তুই রেঁধে তোর ওই কালোহাত দিয়ে সাধুসেবা করবি। নে, সব ধরা-চূড়া খুলে শুলুম তোর মেঝেতে। আগে তো এক ছিলিম তামাক খাই, পরে অন্য কথা’।
এই বলে টানটান হয়ে শুয়ে পড়লেন। তখন কোথায় গেল আমার কান্না! খাবার ব্যবস্থা করতে ছুটোছুটি শুরু করলাম। আমি যেখানে রান্না বসিয়েছি, এসে বসলেন মাটিতেই। বললাম, ‘আসন দিই?’
বললেন, ‘না। রাখ তো আদিখ্যেতা। হ্যাঁরে শাঁকচুন্নী, শেষ পর্যন্ত তোর হাতের চচ্চড়ি খেতে এলাম রে! এত থাকতে তোর চচ্চড়ি বড়ি দিয়ে মনে পড়ে গেল। ওইটি রাঁধবি বুঝলি।‘
কে বলবে, এ আমেরিকা কাঁপিয়ে দিয়ে এসেছে।
আমি যতই বলি, ‘ওপরে গিয়ে বস না।‘
বলেন, ‘সে কি রে, আমি কি তোর শ্বশুরঘরের লোক যে অমন করছিস? একটা গান করি। বাদ্যযন্ত্র কিছু আছে?’
আমি বললাম, ‘আমি কি ওসব নিয়ে এসেছি নাকি?’
‘তবে থালাটা দে।‘ থালা বাজিয়েই একটা গান ধরলেন। সে যে কি মধু! কান ভরে আছে এখনো।
গান ধরেছেন – ‘শ্যামা মা কে আমার কালো রে,
কালো রূপে দিগম্বরী হৃদপদ্ম করে আলো রে!’
আর কী হাসি! বাবা! কী আনন্দই না ঝরে পড়ছে। আমি তো রাঁধছি, ওই গান শুনে উঠে পালাচ্ছি। তখন বললেন, ‘তবে অন্য গান শোন। ঠাকুরকে যে গানে মুগ্ধ করেছিলাম সেই প্রথম দিনের গানটা করি’।
‘মন চল নিজ নিকেতনে!
সংসার – বিদেশে বিদেশীর বেশে ভ্রম কেন অকারণে’।
একটার পর একটা গান গেয়ে চললে ঈশ্বরের জন্য কান্না রান্না হলো, স্নান করতে বললাম। নিচে গিয়ে নিজেই কুয়ো থেকে জল তুলে বেশ করে স্নান সারলেন।

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‘শাঁকচুন্নী, দে এবারে, সামনে বস, সাধুসেবা কর। চচ্চড়ি দে। ছোলার ডাল মোটা করে রেঁধেছিস। বাহ, তোর তবে মনে আছে আমি কি চাই’। আর মুখে দক্ষিনেশ্বরের কাহিনী। ঠাকুর কেমন করে গাইতেন, নাচতেন, আবার রেগে গিয়ে বকতেন, তারপরই হাত ভর্তি প্রসাদ দিতেন – এইসব। তারপর মেঝেতে শুয়ে ঘুম। বললেন ‘ডাকিস নি’। লম্বা ঘুম দিয়ে বিকেলে উঠে বললেন, ‘ওরে শাঁকচুন্নী, অনেক বছর এমন ঘুম ঘুমোইনি’। সন্ধ্যা কাটিয়ে চলে গেলেন। আমি দুচোখে ওঁর পথ চেয়ে রইলাম। বললেন, ‘একদম মন খারাপ করবিনি। তোর কিসের দুঃখ! তোর ভাবনা তিনি, তাঁর ভাবনা তুই। ঠাকুর তোর পা ছড়িয়ে কান্না ভালোবাসতেন, তোকে খেপিয়ে কাঁদাতেন, আজো তাই। তুই পা ছড়িয়ে বসে কাঁদিস। দক্ষিনেশ্বরে ছোটবেলায় কাঁদতিস তোর নিজের জন্য, এখন কাঁদিস তাঁর জন্য। নিজের কান্না আর্তনাদ, ঈশ্বরের জন্য কান্না তাঁর গুণকীর্তন”।

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ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণ ও গুরুকৃপা II ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণের পাঁচপ্রকার সমাধি

ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণের পাঁচপ্রকার সমাধি

Sri Ramakrishna

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Sri Ramakrishna

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কথামৃতম্

[ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণ ও গুরুকৃপা ]
আবার সকলে চুপ করিয়া আছেন। অহেতুক-কৃপাসিন্ধু ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণ আবার কথা কহিতেছেন। আপনি কে, এই তত্ত্ব নরেন্দ্রাদি ভক্তগণকে আবার বুঝাইতেছেন।
শ্রীরামকৃষ্ণ (নরেন্দ্রাদি ভক্তের প্রতি) — ছাদ তো দেখা যায়! — কিন্তু ছাদে উঠা বড় শক্ত!
নরেন্দ্র — আজ্ঞে হাঁ।
শ্রীরামকৃষ্ণ — তবে যদি কেউ উঠে থাকে, দড়ি ফেলে দিলে আর-একজনকে তুলে নিতে পারে।
[ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণের পাঁচপ্রকার সমাধি ]
“হৃষীকেশের সাধু এসেছিল। সে (আমাকে) বললে, কি আশ্চর্য! তোমাতে পাঁচপ্রকার সমাধি দেখলাম!
“কখন কপিবৎ — দেহবৃক্ষে বানরের ন্যায় মহাবায়ু যেন এ-ডাল থেকে ও-ডালে একেবারে লাফ দিয়ে উঠে, আর সমাধি হয়।
“কখন মীনবৎ — মাছ যেমন জলের ভিতরে সড়াৎ সড়াৎ করে যায় আর সুখে বেড়ায়, তেমনি মহাবায়ু দেহের ভিতর চলতে থাকে আর সমাধি হয়।
“কখন বা পক্ষীবৎ — দেহবৃক্ষে পাখির ন্যায় কখনও এডালে কখনও ও-ডালে।
“কখন পিপীলিকাবৎ — মহাবায়ু পিঁপড়ের মতো একটু একটু করে ভিতরে উঠতে থাকে, তারপর সহস্রারে বায়ু উঠলে সমাধি হয়। কখন বা তির্যক্‌বৎ — অর্থাৎ মাহবায়ুর গতি সর্পের ন্যায় আঁকা-ব্যাঁকা; তারপর সহস্রারে গিয়ে সমাধি।”
রাখাল (ভক্তদের প্রতি) — থাক আর কথায়, — অনেক কথা হয়ে গেল; — অসুখ করবে।
“ওঁ নিরঞ্জনং নিত্যমনন্তরূপং ভক্তানুকম্পাধৃতবিগ্রহং বৈ।
ঈশাবতারং পরমেশমীড্যং তং রামকৃষ্ণং শিরসা নমামি।।”

Bring all light into the world. Light, bring light- Swami Vivekananda

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Swami Vivekananda
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Convey all light to the world. Light, bring light! Let light come unto each one; the assignment won’t be done until everybody has achieved the Lord. _Swami Vivekananda

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संसार में ज्ञान के प्रकाश का विस्तार करो; प्रकाश – सिर्फ प्रकाश लाओ। प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करे। जब तक सब लोग भगवान् के निकट न पहुँच जाएँ, तब तक तुम्हारा कार्य शेष नहीं हुआ है।

स्वामी विवेकानन्द

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কামিনী কাঞ্চনে জীবকে বদ্ধ করে , জীবের স্বাধীনতা যায়

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Sri Ramakrishna
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Sri Ramakrishna


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“তব কথামৃতং তপ্তজীবনং, কবিভিরীড়িতং কল্মষাপহম্‌ ৷
শ্রবণমঙ্গলং শ্রীমদাততং, ভুবি গৃণন্তি যে ভূরিদা জনাঃ ৷৷”
🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿?🌿🌿🌿?🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺
*” জয়পুরের  গোবীনজীর পূজারীরা  প্রথম- প্রথম বিবাহ  করে নাই | তখন  খুব  তেজস্বী ছিল | রাজা  একবার  ডেকে  পাঠিয়েছিলেন , তা তারা  যায় নাই | বলেছিল , ” রাজাকে  আসতে বল |”  তারপর  রাজা  ও  পাঁচজনে , তাদের বিয়ে দিয়ে  দিলেন | তখন রাজার  সঙ্গে  দেখা  করবার  জন্য , আর কাহাকেও ডাকতে হল না | নিজে নিজেই  গিয়ে  উপস্থিত | ” মহারাজ,  আশির্বাদ  করতে  এসেছি , এই নির্মাল্য এনেছি , ধারণ করুন |” কাজে কাজেই  আসতে হয় ; আজ  ঘর তুলতে হবে , আজ  ছেলের  অন্নপ্রাসন , আজ হাতে  খড়ি এই  সব | “
*” কামিনী কাঞ্চনে জীবকে  বদ্ধ  করে , জীবের  স্বাধীনতা  যায় | কামিনী  থেকেই  কাঞ্চনের  দরকার | তার  জন্য পরের দাসত্ব | স্বাধীনতা চলে যায় | তোমার  মনের মতো  কাজ  করতে পার না | “* 
*” এই  কামিনী  – কাঞ্চনে  আসক্তি  মানুসকে হীনবুদ্ধি করেছে | হরমোহন যখন  প্রথমে  গেল , তখন বেশ  লক্ষণ ছিল | দেখবার জন্য আমি ব্যাকুল হতাম | তখন বয়স ১৭-১৮- হবে | প্রায় ডেকে- ডেকে পাঠাই , আর যায় না | এখন স্ত্রীকে  এনে  আলাদা বাসা করেছে ! মামার  বাড়িতে ছিল , বেশ ছিল | সংসারের  কোন ঝঞ্ঝাট  ছিল না | এখন  আলাদা বাসা করে  পরিবারের  রোজ  বাজার করে | সেদিন  ওখানে  গিয়েছিল |  আমি বললাম , ” যা  এখান থেকে চলে  যা —— তোকে  ছুঁতে  আমার  গা  কেমন করছে |” [শ্রীশ্র্রীরামকৃষ্ণ]
🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺
“ওঁ নিরঞ্জনং নিত্যমনন্তরূপং ভক্তানুকম্পাধৃতবিগ্রহং বৈ।
ঈশাবতারং পরমেশমীড্যং তং রামকৃষ্ণং শিরসা নমামি।।”
Harmony of four yogas: AGraphic presentation
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"মানুষ পূর্বে কিছুটা পবিত্র ছিল, আরও পবিত্র হইল— এমন নহে ;

|| হাত সরাইয়া লও ||

“মানুষ পূর্বে কিছুটা পবিত্র ছিল, আরও পবিত্র হইল— এমন নহে ;
বাস্তবিক সে পূর্ব হইতেই শুদ্ধ—-তাহার এই শুদ্ধ স্বভাব একটু একটু করিয়া প্রকাশ পাইতেছে মাত্র।
আবরণ চলিয়া যায় এবং আত্মার স্বাভাবিক পবিত্রতা প্রকাশিত হইতে আরম্ভ করে।এই #অনন্ত___পবিত্রতা___মুক্তস্বভাব___প্রেম__ও___ঐশ্বর্য___পূর্ব___হইতেই___আমাদের___মধ্যে___বিদ্যমান।
…….হে সর্বশক্তিমান, ওঠ, জাগো ; #স্বরূপ প্রকাশ কর।
◆তুমি নিজেকে পাপী বলিয়া মনে কর, তোমার পক্ষে ইহা শোভা পায় না।
◆তুমি নিজেকে দুর্বল বলিয়া ভাব, ইহা তোমার উপযুক্ত নয়।”
“আমাদিগকে ভ্রমে বা অজ্ঞানে ফেলিয়াছে কে ?  আমরা নিজেরাই।
আমরা নিজ নিজ চোখে হাত দিয়া ‘অন্ধকার’ ‘অন্ধকার’ বলিয়া চিৎকার করিতেছি। হাত সরাইয়া লও , দেখিবে আলোক আমাদের জন্য সর্বদাই রহিয়াছে, সেই জীবাত্মার স্বপ্রকাশ আলোক।”
…………”জীব-জগতের সর্বত্র তোর সত্তা দেখে অবাক হয়ে পড়বি।স্থাবর ও জঙ্গম সমস্থ তোর আপনার সত্তা বলে বোধ হবে।তখন সকলকে #আপনার মতো যত্ন না করে থাকতে পারবিনি। এরূপ অবস্থাই
হচ্ছে Practical Vedanta—#বুঝলি?
তিনি(ব্রহ্ম) এক হয়েও ব্যবহারিকভাবে বহুরূপে সামনে রয়েছেন | “
♥স্বামী বিবেকানন্দ♥

চেষ্টা করি ধ্যানস্থ মানুষটির শান্ত সেই দু-নয়নকে নিজের অন্তরে খুঁজে পাওয়ার

শান্ত সেই দুই নয়নের খোঁজে :-

___________________________
ছাত্রাবস্থাতে একবার মনে হয়েছিল দীক্ষা নেব | গুরু  আমায় পথ দেখাবেন | তখন রামকৃষ্ণ মঠ ও মিশনের অধ্যক্ষ যিনি ছিলেন ,শুনলাম তিনি পুরুলিয়া আসবেন দীক্ষা দিতে |বিশ্বাস ছিল মা আব্বা কেউই আপত্তি করবেন না | কিন্তু দিন যত এগিয়ে আসতে লাগলো ,ততই আমার মনের উৎসাহ কমে আসতে লাগলো | দুবেলা প্রার্থনা করি ,মনের সবটুকু দেওয়ার চেষ্টা করি ঠাকুরের পায়ে ;কিন্তু দীক্ষা নেওয়ার ইচ্ছাটা আর রইলো না | পরে বুঝেছিলাম –আমার সময় হয়নি | সময় হলে নিশ্চিতভাবে আমি দীক্ষা পাওয়ার অধিকারী হবো | তবু আফশোস রয়ে গেছে |
যেমনভাবে আরেকটা আফশোস রয়ে গেছে মন্দিরে আরতি করা নিয়ে | বড় ইচ্ছা ছিল ,বিদ্যাপীঠের মূল প্রার্থনাঘরে ঠাকুরের মর্মর মূর্তির সামনে দাঁড়িয়ে তাঁর আরতি করব |চামর দুলিয়ে আমার সমস্ত শ্রদ্ধা,সব ভালবাসা নিবেদন করব তাঁর চরণে | আমার পিছনে গান ভেসে আসবে –“জয় জয় আরতি তোমার,হর হর আরতি তোমার,শিব শিব আরতি তোমার “| সে-সাধ মেটেনি | বীজমন্ত্র আমি পাইনি | আর সে-মন্ত্র ছাড়া আরতি সম্ভব নয় |
স্বামীজি বলেছিলেন,ইসলামীয় শরীর এবং বৈদান্তিক মস্তিষ্কের কথা | রামকৃষ্ণ মিশনে প্রিয় শিক্ষক বারে বারে মনে করিয়ে দিতেন সে-কথা | তখন পুরোপুরি বুঝিনি | আজ যখন চারপাশের জগতের দিকে তাকাই ,তখন বুঝতে পারি এই সমন্বয়ের প্রয়োজনীয়তা | আক্ষরিকভাবে এবং রূপকার্থে –উভয়ভাবেই সেই সমন্বয়ের সুযোগ আমি পেয়েছি | মহীরুহ হয়ে ওঠার সুযোগ আর নেই | তবু এখনো ভালো ছাত্রকে এগিয়ে দিই নিজ সংগ্রহের ” শ্রীশ্রীরামকৃষ্ণকথামৃত” | দরিদ্র আদিবাসী ছাত্রকে পড়তে দিই স্বামীজীর রচনার সেই অংশ –যেখানে রয়েছে দরিদ্র আইরিশ মানুষদের কথা ,যারা পজিটিভ চিন্তার ছোঁয়ায় নতুন করে বেঁচে উঠেছিল | 
চেষ্টা করি ধ্যানস্থ মানুষটির শান্ত সেই দু-নয়নকে নিজের অন্তরে খুঁজে পাওয়ার ||”

তীর্থযাত্রা সম্পূর্ণ করতে হলে এই পাঁচটি জলাধারে স্নান করতে হয়। ..**পুরীর পঞ্চতীর্থ**…



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**পুরীর পঞ্চতীর্থ**…

পুরীর পঞ্চতীর্থ
পুরীর পঞ্চতীর্থ



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পঞ্চতীর্থ বলতে ভারতের পুরী শহরে অবস্থিত পাঁচটি জলাধারকে বোঝায়। 

হিন্দুরা বিশ্বাস করেন, পুরীতে তীর্থযাত্রা সম্পূর্ণ করতে হলে এই পাঁচটি জলাধারে স্নান করতে হয়। এই পাঁচটি জলাধার হল:….

**ইন্দ্রদ্যুম্ন কুণ্ড** :-: গুণ্ডিচা মন্দিরের কাছে অবস্থিত। মহাভারতে রাজা ইন্দ্রদ্যুম্নের অশ্বমেধ যজ্ঞ ও জগন্নাথ সংস্কৃতির চার প্রধান দেবতার আবির্ভাব বর্ণিত হয়েছে। এই মহাকাব্যে আছে, কিভাবে সহস্রাধিক গরুর ক্ষুরের চাপে পবিত্র ইন্দ্রদ্যুম্ন জলাধার নির্মিত হয়েছিল। রাজা ইন্দ্রদ্যুম্ন এই জলাধার ব্রাহ্মণদের দান করেছিলেন।..

**রোহিণী কুণ্ড**:– জগন্নাথ মন্দির চত্বরের মধ্যে বিমলা মন্দিরের কাছে অবস্থিত। এই কুণ্ডকে নারায়ণের বাসস্থান মনে করা হয়। এই জলাধারের কাছে অক্ষয়কল্প বট নামে একটি বটগাছকে পূজা করা হয়। পুরাণ মতে, ব্যাধ জড়শবর দুর্ঘটনাক্রমে কৃষ্ণকে হত্যা করেন এবং তাঁর সৎকার করেন। কৃষ্ণ জড়কে স্বপ্নে দেখা দিয়ে বলেন, তাঁর দেহাবশেষ একটি কাঠের টুকরোয় পরিণত হয়েছে। টুকরোটি সমুদ্র থেকে রোহিণী কুণ্ডে এসে উঠবে। জড়ের সাহায্যে ইন্দ্রদ্যুম্ন সেই টুকরোটি দেখতে পান। এই টুকরোতেই জগন্নাথের মূর্তি নির্মিত হয়।…

**মার্কণ্ডেয় কুণ্ড** হল পুরীর তীর্থ পরিক্রমার প্রথম স্থান। জলাধারটির আয়তন ৪ একর। এর পাশে মার্কণ্ডেয়েশ্বরের মন্দির আছে।…

** শ্বেতগঙ্গা কুণ্ড ** নীলাচলের দক্ষিণে অবস্থিত। এই কুণ্ডের পাশে বিষ্ণুর মৎস্য অবতার ও রাজা শ্বেতের মন্দির আছে। স্বর্গোদ্বার অঞ্চলের সমুদ্রকে “মহোদধি” বলা হয়। এটি একটি স্নানক্ষেত্র।…

**পুরীর পঞ্চতীর্থ**

**পুরীর পঞ্চতীর্থ**



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  *******অন্য একটি মতে পুরীর পঞ্চতীর্থ হল::–   
   1) বলরাম…
   2) অক্ষয়বট…
   3) মার্কণ্ডেয় কুণ্ড…
   4) ইন্দ্রদ্যুম্ন কুণ্ড…
   5) সমুদ্র……….//pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js

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সন্তানবৎসলা শ্রীশ্রীমা II একদিন সে মাতামহীর নিকট শুইয়া আছে, ঠাকুরদেবতার গল্প প্রসঙ্গে মাতামহী বলিলেন, — ভক্তি হ’লে ভগবানকে পাওয়া যায়।

সন্তানবৎসলা শ্রীশ্রীমা ( ১ম পর্ব )

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          মায়ের এক অদ্ভুত আকর্ষণী শক্তি ছিল। আবালবৃদ্ধ যে-কেহ একবার তাঁহার সান্নিধ্যে আসিয়াছে, তাঁহার অহেতুক স্নেহ ও আকর্ষণ জীবনে ভুলিতে পারে নাই। দক্ষিণ-কলিকাতার এক ব্রাহ্মণকন্যা শৈশব হইতেই মায়ের দর্শনর সৌভাগ্য লাভ করে। মাকে তাহার এত ভাল লাগিত যে, আত্মীয়পরিজনের সহিত যখন-তখন সে মায়ের বাড়ীতে চলিয়া আসিত তাঁহার দর্শনের জন্য। মধ্যে মধ্যে মায়ের নিকট রাত্রিযাপনও করিত। মাতা তাহাকে অতিশয় স্নেহ করিতেন।
      একদিন সে মাতামহীর নিকট শুইয়া আছে, ঠাকুরদেবতার গল্প প্রসঙ্গে মাতামহী বলিলেন, — ভক্তি হ’লে ভগবানকে পাওয়া যায়।
Sri Sarada Devi
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Sri Sarada Devi
        ভক্তি যে কি বস্তু, সে জ্ঞান তখনও কন্যার হয় নাই, প্রশ্ন করিল, — ভক্তি কোথায় পাওয়া যায় দিদিমা ?
      সেই -যে পরমহংস মশায়ের পরিবার, তাঁর কাছে আছে। তিনিই ভক্তি দিতে পারেন।
      কন্যার মনে কৌতূহল জাগে, ঐ বস্তুটি পাইতে হইবে।
       দ্বিতীয় সহোদর তাহাকে অধিক স্নেহ করিতেন। তাঁহাকে সে পরদিবসই বলিল, — সেই মায়ের কাছে নিয়ে চল, ভক্তি আনতে হবে। কথা শুনিয়া তিনি তো প্রথমে খুব হাসিতে লাগিলেন, পরে তাহার আবদারে স্বীকৃত হইলেন। মাকে তিনিও ভক্তি করিতেন ; ভাবিলেন, ভগ্নীকে উপলক্ষ করিয়া তাঁহারও মাতৃদর্শন হইবে।
     দুইজনে ভবানীপুর হইতে বোসপাড়া লেনে মাতাঠাকুরাণীর বাড়ীতে আসিয়া উপস্থিত হইলেন। মা তখন সবেমাত্র ঠাকুরঘর হইতে বাহিরে আসিয়াছেন, কন্যা প্রণাম করিতেও ভুলিয়া গেল, ছুটিয়া গিয়া মায়ের বস্ত্রাঞ্চল ধরিয়া বলিল, — তোমার কাছে না-কি ভক্তি আছে, আমায় দাও।
      শুনিয়া মাতাঠাকুরাণী হাসিতে হাসিতে বলেন, — ওমা, এ খুদেভক্ত বলে কি গো!  আমার কাছে যে ভক্তি আছে, কে বলেছে তোমায় ?
     — দিদিমা-যে বললে, তোমার কাছে আছে।
     গিরিশচন্দ্রের ভগ্নী ন’দিদি এবং যোগেনমার গর্ভধারিণী উপস্থিত ছিলেন, তাঁহারা খুব উৎসাহ দিতে লাগিলেন, — শক্ত ক’রে ধরো খুকি, মা-ঠাকুরুণের কাছেই ভক্তি আছে। মায়ের বস্ত্রাঞ্চল সে আরও শক্ত করিয়া ধরিল এবং একেবারে গাত্রসংলগ্ন হইয়া দাঁড়াইয়া রহিল।
      আচ্ছা, দাঁড়া বাপু, এনে দিচ্ছি ; এই বলিয়া ঠাকুরঘর হইতে মা একখানি প্রসাদী অমৃতি-জিলিপি আনিয়া কন্যার হাতে দিলেন।
    ভক্তিপ্রাপ্তির কাহিনী ততক্ষণে প্রচার হইয়া গিয়াছে। অনেকে আসিয়া সেখানে উপস্থিত হইলেন। তাহাকে ঘিরিয়া সকলেই ভক্তির জন্য হাত পাতিলেন ; এ বলে, — দিদি, আমায় একটু দাও ; ও বলে, — খুকি, আমায় একটুখানি দাও। মা-ঠাকরুণ তোমায় ভক্তি দিয়েছেন, আমাদের সবাইকে ভাগ দিতে হবে।
      এই অবস্থার জন্য কন্যা আদৌ প্রস্তুত ছিল না। সকলকে কিছু কিছু ভাগ দিয়া নিজেও একটু গ্রহণ করিল এবং একটু রাখিয়া দিল। ( এই ভক্তিমতী কন্যা দুর্গাপুরী দেবী )  
                                                                ( সারদা-রামকৃষ্ণ )

আজ একটি সত্য ঘটনা বলবো বন্ধুদের জন্য …..

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আজ একটি সত্য ঘটনা বলবো বন্ধুদের জন্য …..

একজন আমায় বলেছিলেন মনে পড়ায় সকলের সাথে শেয়ার করতে ইচ্ছে হলো । তখন ইংরাজ শাসন …..
একটি ছেলে তখনকার দিনে সেই সরকারের অধীনস্ত ছিল । ছেলেটির বাবা ছিল না  তার মা  তাকে খুবই কষ্ট করে বড় করেছিলেন । কিন্তু চাকুরী পাবার সে তার মা কে বাড়ি থেকে বের করে দেয় । কোনক্রমে  সেই ইংরাজ অফিসার এর কানে কথাখানি পৌঁছায় । বেতনের দিন তিনি ছেলেটিকে বলেন তার বেতন থেকে একটি টাকা দিতে ।  ছেলেটি কিন্তু হতবাক । সে ভাবছে টাকা চাইছে তার boss তাও আবার তারই মাইনের টাকা থেকে ।

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যায় হোক boss বলে কথা । সে টাকাটি দিলো । তখন তাকে সেই ইংরেজ অফিসার বললেন , বাজার হতে একটি বড় কাঁঠাল আর একটা গামছা আনতে । সে অবশেষে  একটি কাঁঠাল ও গামছা এনে দিলো ঐ অফিসার এর হাতে । তখন অফিসার তাকে বললেন বেশ এবার আমি তোমায় এই কাঁঠাল খানি গামছা দিয়ে তোমার পেটে বেঁধে দিচ্ছি, তারপর তুমি ওই অবস্থায় 2 কিলোমিটার হেঁটে এসো। তারপর ছেলেটি কোনমতে এক কিলোমিটার হেঁটে এসে বললো আর সে হাঁটতে পারছে না । তখন সেই অফিসার তাকে বললো তাহলে বলো তো তোমার মায়ের কত খানি কষ্ট হয়েছে তোমায় দশ দিন দশ মাস পেটে রাখতে। আজ তুমি সেই মা কে বের করে দিয়েছো বাড়ি থেকে । ছেলেটি লজ্জায় মাথা নিচু করে বেরিয়ে গেল আর নিজের মা কে আবার নিজের কাছে ফিরিয়ে নিয়েছিল । বলুন তো বন্ধুরা মা এর কষ্ট অমরা কেন বুঝিনা ।
আজ কেন এত বৃদ্ধাশ্রম ????

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