হে ঠাকুর, আমি ভক্তিহীন। হে দেব, সদা আমার প্রতি কৃপাদৃষ্টি দান করো।——-

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জ্ঞানাঞ্জন বিমল-নয়ন বীক্ষণে মোহ যায়
জ্ঞানাঞ্জন বিমল-নয়ন বীক্ষণে মোহ যায়

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♥♠♥ জ্ঞানাঞ্জন বিমল-নয়ন বীক্ষণে মোহ যায়।♥♠♥~~~~~~    

—- প্রত্যক্ষদর্শীরা বলেন— ঠাকুরের চোখ-দুটি ছিল টানা, খুব উজ্জ্বল ও অন্তর্ভেদী, প্রেম ও করুণায় ভরা।সাধনকালে তিনি এমন অনুরাগের সঙ্গে মায়ের দর্শনের জন্য কাঁদতেন, যে, তাঁর অশ্রুতে পঞ্চবটীর মাটি ভিজে যেত।পরবর্তীকালে কেউ ঠাকুরকে জিজ্ঞাসা করে,” কি করলে ভগবান দর্শন হয়?” ঠাকুর উত্তর দেন,” রোজ একবার করে কাঁদতে পার?” আমাদের ভিতরটা এত শুকনো যে, এ পোড়া চোখে জলও আসে না। একমাত্র ঠাকুরের কৃপাদৃষ্টিতেই আমাদের মায়ামোহ কাটতে পারে। আমরা যখন ঠাকুরের জ্ঞানঘন চোখদুটির দিকে তাকাই, তখন আমাদের ভিতরের পবিত্রতা স্ফুরিত হয়, সব অশুচিতা লজ্জায় লুকিয়ে পড়ে। তাই প্রার্থনা করি ঃ ” হে রামকৃষ্ণ ত্বয়ি ভক্তিহীনে/কৃপাকটাক্ষং কুরু দেব নিত্যম।”—- হে ঠাকুর, আমি ভক্তিহীন। হে দেব, সদা আমার প্রতি কৃপাদৃষ্টি দান করো।——-         

—-দক্ষিনভারতের এক সাধক কবি শ্রীরামকৃষ্ণের মধুর মুরতি ধ্যানযোগে বর্ণনা করেছেন ‘ শ্রীরামকৃষ্ণকর্ণামৃতম্’ গ্রন্থে ঃ “হে রামকৃষ্ণ মধুরং তব সচ্চরিত্রং / তৎ পুণ্যনাম মধুরং মধুরং ত্বদঙ্গম্।/ সম্ভাষনং চ মধুরং মধুরং চ গানং/ তৎ কিং নু যন্ন মধুরং ভবতি ত্বদীয়ম্।।
——- হে রামকৃষ্ণ,  তোমার চরিতকথা মধুর।তোমার পুণ্য নাম, অঙ্গ, কথা মধুময়। তোমার ভিতর এমন কিছু আছে কি যা মধুময় নয়?♥♠♥~~(স্বামী চেতনানন্দ)

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ये हैं वो आठ योगी महापुरुष जो आज भी जीवित और अमर माने जाते हैं

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ये हैं वो आठ योगी महापुरुष जो आज भी जीवित  और अमर माने जाते हैं
ये हैं वो आठ योगी महापुरुष जो आज भी जीवित  और अमर माने जाते हैं

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अश्वस्थामा, राजा बलि, व्यास मुनि, हनुमान, बिभीषण, कृपाचार्य, परसुराम भगवान, मार्कण्डेय ऋषि ये जीवित है ।

1. महावीर हनुमान – अंजनी पुत्र हनुमान जी को अजर और अमर रहने के वरदान मिला है तथा इन की मौजूदगी रामायण और महाभारत दोनों जगह पर पाई गई है.रामायण में हनुमान जी ने प्रभु राम की सीता माता को रावण के कैद से छुड़वाने में मदद की थी और महाभारत में उन्होंने भीम के घमंड को तोडा था. सीता माता ने हनुमान को अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनाने पर वरदान दिया था की वे सदेव अजर-अमर रहेंगे. अजर-अमर का अर्थ है की उनकी कभी मृत्यु नही होगी और नही वे कभी बूढ़े होंगे. माना जाता है की हनुमान जी इस धरती पर आज भी विचरण करते है.
2. अश्वत्थामा – अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचर्य के पुत्र है तथा उनके मष्तक में अमरमणि विध्यमान है. अश्वत्थामा ने सोते हुए पांडवो के पुत्रो की हत्या करी थी जिस कारण भगवान कृष्ण ने उन्हें कालांतर तक अपने पापो के प्रायश्चित के लिए इस धरती में ही भटकने का श्राप दिया था. हरियाणा के करुक्षेत्र और अन्य तीर्थ में उनके दिखाई दिए जाने के दावे किये जाते है तथा मध्यप्रदेश के बुराहनपुर में उनके दिखाई दिए जाने की घटना प्रचलित है.
3. ऋषि मार्कण्डेय – ऋषि मार्कण्डेय भगवान शिव के परम भक्त है. उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपश्या द्वारा महामृत्युंजय तप को सिद्ध कर मृत्यु पर विजयी पा ली और चिरंजीवी हो गए.
4. भगवान परशुराम -परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता का नाम रेणुका था. परशुराम का पहले नाम राम था परन्तु इस शिव के परम भक्त थे. उनकी कठोर तपश्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें एक फरसा दिया जिस कारण उनका नाम परशुराम पड़ा.

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5. कृपाचार्य -कृपाचार्य शरद्वान गौतम के पुत्र हैं। वन में शिकार खेलते हुए शांतनु को दो शिशु मिले जिनका नाम उन्होंने कृपि और कृप रखा तथा उनका पालन पोषण किया. कृपाचार्य कौरवो के कुलगुरु तथा अश्वत्थामा के मामा हैं, उन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवो को साथ दिया.
6. विभीषण – विभीषण ने भगवान राम की महिमा जान कर युद्ध में अपने भाई रावण का साथ छोड़ प्रभु राम का साथ दिया. राम ने विभीषण को अजर-अमर रहने का वरदान दिया था.
7. वेद व्यास – ऋषि व्यास ने महाभारत जैसे प्रसिद्ध काव्य की रचना की है. उनके द्वारा समस्त वेदो एवं पुराणो की रचना हुई. वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र है. ऋषि वेदव्यास भी अष्टचिरंजीवियो में सम्लित है.

8. राजा बलि – राजा बलि को महादानी के रूप में जाना जाता है. उन्होंने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया अतः भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल का राजा बनाया और अमरता का वरदान दिया. राजा बलि प्रह्लाद के वंशज है।

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Swami Mumukshanandaji passed away at 7.45 pm

Swami Mumukshanandaji Maharaj का ahbhi बेलूरमठ में देहांत हो गया, 10 मिनिट पहले।बहती sad न्यूज़।
Amra akjan ideal sadhu k
Haralam, fromR.k.Mission
Deoghar.

Swami Mumukshanandaji passed away at 7.45 pm today (16 January)

He was a Trustee of Ramakrishna Math & Member of the Governing Body of Ramakrishna Mission. He was a disciple of Sw. Virajanandaji, 6th. President of Ramakrishna Mission.
He was 2nd. Principal of Probationers’ Training Centre(’76-’83), Head of Mumbai(’83-’86), Rajkot(’86-’91), Mayavati(’91-’06) & Udbodhan(’06-’13) centres. From Apr.’13 he was in retired life at Belur Math.
We are sorry to announce the passing away of Swami Mumukshanandaji (RanjanMaharaj) at Arogya Bhavan, Belur Math, today (16 January 2017) at about 7.50pm.  He was 90. Cremation will be held at Belur Math tomorrow (17January 2017)

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

হরি ওঁ রামকৃষ্ণ

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

Swami Mumukshanandaji

Somebody will find their "Relentless Why" II why not you?

Somebody will find their “Relentless Why” II why not you? 

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Somebody will find their “Relentless Why” II why not you?



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A new week, a new day, make a choice, have a good day or a great day.

Every day is a new beginning, Smile & start again. Somebody will accomplish something crisp, new and fearless today… why not you? 
Somebody will get to know an outsider, convey the plan to the miserable and model goodness… why not you? 

Somebody will transform torment into influence, fear into fortune and disarray into lucidity… why not you? 

Somebody will be perceived for their dominance, celebrated for their insight and lauded for their magnificence… why not you? 

Somebody will fashion another begin, introduce another propensity and assemble a superior everyday practice… why not you? 

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Somebody will relinquish their past, overhaul their present and modify their future… why not you? 

Somebody will get the deal, complete the book or close the arrangement… why not you? 

Somebody will set bigger objectives, go for broke and go as far as possible… why not you? 

Somebody will demonstrate remarkable graciousness, be a supplier, not a taker and leave individuals superior to anything they discovered them… why not you? 

Somebody will find their “Relentless Why”, reconnect with their motivation thus emanate their enthusiasm… why, not you? 
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Somebody will discharge their reasons, break their questions and break free of their chains… why not you? 

Somebody will encounter genuine appreciation, talk genuine thankfulness and feel earnest bliss… why not you? 

Indeed—why not you. 
Another week comes in.

A new week for you to pursue your dreams.
Have a great week ahead and stay blessed always.


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" দেখ গিরিশবাবু, মনে হয় এই জগতের দুঃখ দূর করতে আমায় যদি হাজারো জন্ম নিতে হয় তাও নেব। তাতে যদি কারও এতটুকু দঃখ দূর হয় তো তা করব।

বাগবাজারে বলরাম বসুর বাড়িতে স্বামীজীর সাথে শিষ্য শরৎচন্দ্র চক্রবর্তীর শাস্ত্র আলোচনা চলছে। এমন সময় সেখানে উপস্থিত হলেন গিরিশচন্দ্র ঘোষ এবং আলোচনা শুনতে লাগলেন নিবিষ্টচিত্তে। এরপর গিরিশবাবু ও স্বামীজীর মধ্যে কিছু কথা হওয়ার পর গিরিশবাবু হঠাৎ করে স্বামীজীকে উদ্দেশ্য করে বলে উঠলেন – ” হ্যাঁ হে নরেন, বেদবেদান্ত তো ঢেপ পড়লে, কিন্তু এই যে দেশে ঘোর হাহাকার, অন্নাভাব, ব্যভিচার, ভ্রূণহত্যা, মহাপাতকাদি চোখের সামনে দিনরাত ঘুরছে, এর উপায় তোমার বেদে কিছু বলেছে? ঐ অমুকের বাড়ির গিন্নি, এককালে যার বাড়িতে রোজ পঞ্চাশখানি পাতা পড়ত, সে আজ তিন দিন হাঁড়ি চাপায়নি; ঐ অমুকের বাড়ির কুলস্ত্রী কে গুন্ডাগুলো অত্যাচার করে মেরে ফেলেছে; ঐ অমুকের বাড়িতে ভ্রূণহত্যা হয়েছে, অমুক জোচ্চুরি করে বিধবার সর্বস্ব হরণ করেছে – এ সকল রহিত করার কোন উপায় তোমার বেদে আছে কি? স্বামীজী নির্বাক, তাঁর চোখ ভরে এল জলে, মনের ভাব গোপন করতে তিনি উঠে চলে গেলেন। গিরিশবাবু শিষ্যকে বললেন – দেখলি বাঙাল, কত বড় প্রাণ ! তোর স্বামীজীকে কেবল বেদজ্ঞ পন্ডিত বলে মানি না ; কিন্তু ঐ যে জীবের দুঃখে কাঁদতে কাঁদতে বেরিয়ে গেল, এই মহাপ্রাণতার জন্য মানি। চোখের সামনে দেখলি তো মানুষের দুঃখকষ্টের কথাগুলো শুনে করুণায় হৃদয় পূর্ণ হয়ে স্বামীজীর বেদবেদান্ত কোথায় উড়ে গেল ।”
           এর কিছুক্ষণ পরে ফিরে এসে স্বামীজী গিরিশবাবুকে বললেন : ” দেখ গিরিশবাবু, মনে হয় এই জগতের দুঃখ দূর করতে আমায় যদি হাজারো জন্ম নিতে হয় তাও নেব। তাতে যদি কারও এতটুকু দঃখ দূর হয় তো  তা করব। মনে হয়, খালি নিজের মুক্তি দিয়ে কি হবে? সকলকে সঙ্গে নিয়ে ঐ পথে যেতে হবে । কেন বল দেখি এমন ভাব ওঠে? ”
             গিরিশবাবু – “তা না হলে আর তিনি (ঠাকুর) তোমায় সকলের চেয়ে বড় আধার বলতেন!”
         মানুষের জন্য স্বামীজীর হৃদয়ে সদা জাগ্রত ছিল এই বেদনাবোধ । পৃথিবীর যে প্রান্তেই থেকেছেন, ভারতের নিরন্ন, পিড়ীত, দূর্গত মানুষের কথা ভেবে গেছেন -এ যেন তাঁর নিজের দায়।

Vivekananda in London, 1895 ১৮৯৫ | বিবেকানন্দ লন্ডনে | সেদিন লেডি ইসাবেল মার্গেসন-এর বাড়িতে একটি ছোট্ট আলোচনা সভায় তাঁর কিছু বলার কথা |বিষয়‚ হিন্দু ভাবনা |

Vivekananda in London,
Vivekananda 

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Vivekananda in London,
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১৮৯৫ | বিবেকানন্দ লন্ডনে |

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সেদিন লেডি ইসাবেল মার্গেসন-এর বাড়িতে একটি ছোট্ট আলোচনা সভায় তাঁর কিছু বলার কথা |বিষয়‚ হিন্দু ভাবনা |ছোট্ট সভা‚ মাত্র পনেরো জন শ্রোতার সমাবেশ |বিবেকানন্দের একেবারে সামনে‚ প্রথম সারিতে‚ একটি আসন খালি |সে এল একটু দেরি করে |বিবেকানন্দ দেখলেন এই নবাগতাকে |নবাগতারও চোখ পড়ল সরাসরি বিবেকানন্দের চোখে |মিস মার্গারেট নোবলকে এই প্রথম দেখলেন বিবেকানন্দ |আর দেখেই যেন চিনতে পারলেন ভবিষ্যতের সিস্টার নিবেদিতাকে | নিবেদিতার মনে হল‚ এই মানুষটির সামনে প্রতিদিন নতজানু হওয়া যায় |প্রতিদিন আমি‚ হে জীবনস্বামী‚ দাঁড়াব তোমারি সম্মুখে |মিশরে বিবেকানন্দ |সেখানে বেড়াতে এসেছেন একান্ত ভক্ত ফরাসি নৃত্যশিল্পী শ্রীমতি কালভের সঙ্গে |বিবেকানন্দ ক্লান্ত |গত ন’ বছরে শুধু কাজ করেছেন তিনি |নিজেকে নিংড়ে দিয়েছেন কর্মব্রত পালন করতে|তিনি ক্রমেই অসুস্থ |তিনি কাঁদছেন আর বলছেন‚ আমি দেশে ফিরতে চাই |কালভেকে বললেন‚ আমি দেশে ফিরতে চাই‚ গুরুভাইদের সান্নিধ্যে মরবার জন্যে |আমার মৃত্যুদিন ৪ ঠা জুলাই !১৯০২ -এর ২১শে জুন |পরমভক্ত ও বন্ধু সিস্টার ক্রিশ্চিন-কে তাঁর শেষ চিঠিতে বিবেকানন্দ লিখলেন‚ আমার কথাটি ফুরলো‚ নটে গাছটি মুড়লো |১৯০২ – এর ২রা জুলাই | মহাপ্রয়াণের দু-দিন আগে |নিবেদিতাকে নেমন্তন্ন করলেন বিবেকানন্দ |খাওয়ালেন কাঁঠালের বিচিসিদ্ধ‚ আলুসিদ্ধ‚ সাদা ভাত‚ বরফ দিয়ে ঠান্ডা করা দুধ |খাবার সময় কত কৌতুক আর মজা করে গল্প করলেন বিবেকানন্দ !খাওয়ার পরে‚ নিবেদিতা প্রতিবাদ করা সত্ত্বেও‚ কী গভীর স্নেহে তাঁর হাত ধুয়ে তোয়ালে দিয়ে মুছে দিলেন |— এ কী করলেন আপনি‚ এ তো আমার করা উচিত আপনাকে !বললেন বিস্মিত নিবেদিতা |— ক্রাইস্ট তো শিষ্যদের পা ধুয়ে দিয়েছিলেন‚ উত্তর দিলেন বিবেকানন্দ |কাঁপা কাঁপা কণ্ঠে নিবেদিতা বললেন‚ কিন্তু সে তো শেষ সময়ে |বিবেকানন্দ হেসে বললেন‚ ইউ সিলি গার্ল —১৯০২ – এর ৪ঠা জুলাই |ভোরবেলা ঘুম ভাঙল বিবেকানন্দের |তাকালেন ক্যালেন্ডারের দিকে |আজই তো সেইদিন |আমেরিকার স্বাধীনতা দিবস |আর আমার দেহত্যাগের দিন |মা ভুবনেশ্বরীর মুখটি মনে পড়ল তাঁর |ধ্যান করলেন সেই দয়াময়‚ প্রসন্ন মুখটি |বুকের মধ্যে অনুভব করলেন নিবিড় বেদনা |তারপর সেই বিচ্ছেদবেদনার সব ছায়া সরে গেল |ভারী উৎফুল্ল বোধ করলেন বিবেকানন্দ |তাঁর মনে আজ নতুন আনন্দ |তাঁর শরীরে আজ নতুন শক্তি |তিনি অনুভব করলেন তাঁর সব অসুখ সেরে গেছে |শরীরে আর কোনও কষ্ট নেই |বিবেকানন্দ ডুবে গেলেন ধ্যানমগ্ন উপাসনায় |উপাসনার পরে গুরুভাইয়ের সঙ্গে হাসিঠাট্টা করতে-করতে সামান্য ফল আর গরম দুধ খেলেন |বেলা সাড়ে আটটা নাগাদ প্রেমানন্দকে ডেকে বললেন‚ আমার পূজার আসন কর ঠাকুরের পূজাগৃহে |সকাল সাড়ে নটায় স্বামী প্রেমানন্দও সেখানে এলেন পূজা করতে |বিবেকানন্দ একা হতে চান |প্রেমানন্দকে বললেন‚ আমার ধ্যানের আসনটা ঠাকুরের শয়নঘরে পেতে দে |এখন আমি সেখানে বসেই ধ্যান করব |অন্যদিন বিবেকানন্দ পুজোর ঘরে বসেই ধ্যান করেন |আজ ঠাকুরের শয়নঘরে প্রেমানন্দ পেতে দিলেন তাঁর ধ্যানের আসন |ধ্যানে বসেছেন বিবেকানন্দ |ধ্যানের মধ্যে তাঁর মনে হল‚ তিনি ঘরে একা নন |ঘরে এত আলো কেন ?এ যে একেবারে আলোর সমুদ্র | আলোর ঢেউ |সেই আলোরই একটি ঢেউ শ্রীরামকৃষ্ণের রূপ ধরে সামনে দাঁড়িয়ে |শ্রীরামকৃষ্ণের এ কীঅপরূপ রূপ !বিবেকানন্দ ধ্যানের মধ্যে বলে ওঠেন‚ ঠাকুর ! তুমি এসেছো !শ্রীরামকৃষ্ণের মুখে সেই হাসি‚ সেই আনন্দ |বিবেকানন্দের বুকের মধ্যে ধ্বনিত হল শ্রীরামকৃষ্ণের কণ্ঠস্বর |নরেন‚ আমি এসেছি‚ তোকে এইটুকু জানাতে‚ তোর কাজ ফুরিয়েছে |আর কোনও কাজ বাকি নেই নরেন |নরেন‚ আমি জানি‚ তোর মনে পড়ে গেছে তুই কে‚ কোথা থেকে এসেছিস মর্ত্যধামে‚ কার কাজে তুই পৃথিবীতে এসেছিস‚ সব এখন জানিস তুই | তোর সব মোহ-আবরণ ক্ষয় হয়েছে নরেন | আমিই তো তোকে ডেকেছিলুম পৃথিবীতে | এবার আমিই তোর বিদায়ের দরজা খুলে দিলুম | তোর ইচ্ছামৃত্যু নরেন | আর দেরি করিসনি | এবার ফিরে আয় | দরজাটুকু পার হলেই দেখবি আমি দাঁড়িয়ে আছি তোর জন্যে | তোকে ছেড়ে আর যে থাকতে পারছিনি রে !বেলা ১১টা পর্যন্ত ধ্যান করলেন বিবেকানন্দ তারপর মন্দির প্রাঙ্গণে পায়চারি করছেন আর গাইছেন:মা কি আমার কালো ?কালোরূপা এলোকেশী হৃদিপদ্ম করে আলো |স্বামীজি গান গাইছেন |পিছনেই প্রেমানন্দ |বিবেকানন্দ হেসে বললেন‚ তাড়াতাড়ি আজ খাওয়াদাওয়া সেরে নে |আজ আমি নিজের ঘরে একলা খাচ্ছিনে |সবার সঙ্গে খেতে বসব |সকালবেলা বেলুড়ঘাটে জেলের নৌকো ভিড়েছিল |নৌকো ভর্তি গঙ্গার ইলিশ |বিবেকানন্দ মহা উৎসাহে ইলিশ কিনিয়েছেন |তাঁরই আদেশে রান্না হয়েছে ইলিশের নানারকম পদ |গুরুভাইদের সঙ্গে মহানন্দে ইলিশভক্ষণে বসলেন বিবেকানন্দ |তিনি জানেন আরও মাত্র কয়েক ঘণ্টার পথ |ডাক্তারের বারণ শুনে চলার আর প্রয়োজন নেই |তিনি পেটভরে খেলেন ইলিশের ঝোল‚ ইলিশের অম্বল‚ ইলিশ ভাজা |দুপুরে মিনিট পনেরো বিছানায় গড়িয়ে নিলেন বিবেকানন্দ |তারপর প্রেমানন্দকে বললেন‚ সন্ন্যাসীর দিবানিদ্রা পাপ |চল একটু পড়াশোনা করা যাক |

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বিবেকানন্দ শুদ্ধানন্দকে বললেন‚ লাইব্রেরি থেকে শুক্লযজুর্বেদটি নিয়ে আয় |তারপর হঠাৎ বললেন‚ এই বেদের মহীধরকৃতভাষ্য আমার মনে লাগে না |আমাদের দেহের অভ্যন্তরে মেরুদণ্ডের মধ্যস্থ শিরাগুচ্ছে‚ ইড়া ও পিঙ্গলার মধ্যবর্তী যে সুষুন্মা নাড়িটি রয়েছে‚ তার বর্ণনা ও ব্যাখ্যা আছে তন্ত্রশাস্ত্রে | আর এই ব্যাখ্যা ও বর্ণনার প্রাথমিক বীজটি নিহিত আছে বৈদিক মন্ত্রের গভীর সংকেতে | মহীধর সেটি ধরতে পারেননি |বিবেকানন্দ এইটুকু বলেই থামলেন |
Vivekananda in London,
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কেউ ধরতেও পারলেন না‚ বিবেকানন্দের মন ইতিমধ্যেই ভাবতে শুরু করেছে মেরুদণ্ড-সংলগ্ন কুলকুণ্ডলিনী – শক্তিকে জাগিয়ে তাকে শরীরের অভ্যন্তরে ষঢ়চক্র ভেদ করিয়ে মস্তিষ্কে পৌঁছে দেবার কথা !এরপর বিবেকানন্দ প্রায় তিন ঘণ্টা ধরে ব্যাকরণ চর্চা করলেন ব্রহ্মচারীদের সঙ্গে |তিনি পাণিনির ব্যাকরণের সূত্রগুলি নানারকম মজার গল্পের সঙ্গে জুড়ে দিতে লাগলেন |ব্যাকরণশাস্ত্রের ক্লাস হাসির হুল্লোড়ে পরিণত হল |বিকেল হয়েছে |প্রেমানন্দকে নিয়ে হাঁটতে বেরিয়েছেন বিবেকানন্দ |হাঁটতে-হাঁটতে একেবারে বেলুড়বাজার পর্যন্ত বেরিয়ে আসলেন |কোনও কষ্টই আজ আর অনুভব করলেন না|বুকে এতটুকু হাঁফ ধরল না |সন্ধেবেলা |মঠে ফিরে এসেছেন বিবেকানন্দ |গঙ্গাঁর ধারে আমগাছের তলায় একটি বেঞ্চি পাতা |সেখানে তামাক খেতে খেতে আড্ডায় বসলেন বিবেকানন্দ |সন্ন্যাসীরা কজনে মিলে চা খাচ্ছেন |স্বামীজিও চা চাইলেন |সন্ধে সাতটা |শুরু হল সন্ধ্যারতি |আর দেরি নয় |শরীরটাকে এবার জীর্ণবস্ত্রের মতো ত্যাগ করতে হবে —বিবেকানন্দ প্রস্তুত |তিনি তরুণ ব্রহ্মচারী ব্রজেন্দ্রকে নিয়ে নিজের ঘরে এলেন |বললেন‚ আমাকে দু – ছড়া মালা দিয়ে তুই বাইরে বসে জপ কর্|আমি না ডাকলে আসবি না |স্বামীজি ধ্যানে বসলেন |তাঁর দেহের মধ্যে‚ মেরুদণ্ডের প্রান্তে‚ মূলাধার পদ্মে তিনটি বেষ্টনে অধোমুখে বিরাজিত পরমাশক্তি কুলকুণ্ডলিনী |সেই কুণ্ডলিনীকে জাগ্রত করতে চলেছেন বিবেকানন্দ |সেই পরমাশক্তিকে প্রথমে ধীরে ধীরে বেষ্টন – মুক্ত করলেন তিনি |তারপর তাঁকে করলেন ঊর্ধ্বমুখ |বিবেকানন্দের সর্বাঙ্গ ঘামে ভিজে গেছে |তাঁর মধ্যে জাগ্রত হয়েছে এক প্রবল শক্তি |সেই সদ্যজাগ্রত বেষ্টনমুক্ত ঊর্ধ্বমুখ ভয়ংকর কুলকুণ্ডলিনীকে মেরুদণ্ড দিয়ে আরোহী করালেন বিবেকানন্দ |মেরুদণ্ড বেয়ে সাপের মতো উঠতে লাগল কুণ্ডলিনী |বিবেকানন্দ চাইছেন সেই প্রবল শক্তিকে মস্তিষ্কে পৌঁছে দিতে |বাধা দিচ্ছে তাঁর শরীরের ষঢ়চক্র |সেই সব বাধা বিবেকানন্দ যোগবলে অতিক্রম করলেন |ভয়ংকর কুলকুণ্ডলিনী ধীরে ধীরে প্রবিষ্ট হল বিবেকানন্দের মস্তিষ্কে |এরপর আর ফেরার পথ বন্ধ |শ্রীরামকৃষ্ণ বলেছিলেন‚ যেদিন নরেন বুঝবে ওর কাজ শেষ হয়েছে‚ সেদিন ও যোগবলে নিজের মুক্তির পথ খুঁজে পাবে |জাগ্রত কুণ্ডলিনী মেরুদণ্ড দিয়ে সাপের মতো উঠে গিয়ে বিবেকানন্দের মস্তিষ্কে যা ঘটাবার তাই ঘটিয়ে দিল |বিবেকানন্দ ধ্যানের মধ্যে দেখতে পেলেন‚ খুলে গেছে তাঁর আলোকময় মহাপ্রস্থানের পথ |বললেন‚ দরজা-জানালা সব খুলে দে | মেঝেতে বিছানা পাতা |সেখানে শুয়ে পড়লেন বিবেকানন্দ | হাতে তাঁর জপের মালা |ব্রজেন্দ্র বাতাস করছেন |বিবেকানন্দ বললেন‚ আর বাতাস করিসনি | একটু পা টিপে দে |রাত ঠিক নটা |বাঁ পাশ ফিরলেন বিবেকানন্দ |তাঁর ডান হাতটা থরথর করে কেঁপে উঠল |কুণ্ডলিনীর শেষ ছোবল |শিশুর মতো কাঁদতে লাগলেন বিবেকানন্দ |তারপর একটি গভীর দীর্ঘশ্বাস |মাথাটা বালিশ থেকে পড়ে গেল |চোখের দুটি তারা চলে এল ভুরুর মাঝখানে |চোখ দুটি ক্রমশ রাঙিয়ে উঠল |ভিতরে রক্ত ঝরেছে |নাকের কোণে রক্তের ফোঁটা |ঠোঁটের কোণে রক্ত |তারপর ক্রমে দিব্যজ্যোতিতে উজ্জ্বল হয়ে উঠল বিবেকানন্দের সারা অঙ্গ |বিবেকানন্দ বলেছিলেন তাঁর মৃত্যুদিন ৪ঠা জুলাই | আর তাঁর বয়েস চল্লিশ পেরবে না |তাঁর বয়েস ঠিক ঊনচল্লিশ বছর‚ পাঁচ মাস‚ পঁচিশ দিন |পরের দিন ভোরবেলা |একটি সুন্দর গালিচার ওপর শায়িত দিব্যভাবদীপ্ত‚ বিভূতি-বিভূষিত‚ বিবেকানন্দ |তাঁর মাথায় ফুলের মুকুট |তাঁর পরনে নবরঞ্জিত গৈরিক বসন |তাঁর প্রসারিত ডান হাতের আঙুলে জড়িয়ে আছে রুদ্রাক্ষের জপমালাটি |তাঁর চোখদুটি যেন ধ্যানমগ্ন শিবের চোখ‚ অর্ধনিমীলিত‚ অন্তর্মুখী‚ অক্ষিতারা |নিবেদিতা ভোরবেলাতেই চলে এসেছেন |স্বামীজির পাশে বসে হাতপাখা দিয়ে অনবরত বাতাস করছেন |তাঁর দুটি গাল বেয়ে নামছে নীরব অজস্র অশ্রুধারা |স্বামীজির মাথা পশ্চিমদিকে |পা-দুখানি পুবে‚ গঙ্গার দিকে |শায়িত বিবেকানন্দের পাশেই নিবেদিতাকে দেখে বোঝা যাচ্ছে সেই গুরুগতপ্রাণা‚ ত্যাগতিতিক্ষানুরাগিণী বিদেশিনী তপস্বিনীর হৃদয় যেন গলে পড়ছে সহস্রধারে | আজকের ভোরবেলাটি তাঁর কাছে বহন করে এনেছে বিশুদ্ধ বেদনা |অসীম ব্যথার পবিত্র পাবকে জ্বলছেন‚ পুড়ছেন তিনি |এই বেদনার সমুদ্রে তিনি একা |

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নির্জনবাসিনী নিবেদিতা |বিবেকানন্দের দেহ স্থাপন করা হল চন্দন কাঠের চিতায় |আর তখুনি সেখানে এসে পৌঁছলেন জননী ভুবনেশ্বরী |চিৎকার করে কাঁদতে- কাঁদতে লুটিয়ে পড়লেন মাটিতে |কী হল আমার নরেনের ?হঠাৎ চলে গেল কেন ?ফিরে আয় নরেন‚ ফিরে আয় |আমাকে ছেড়ে যাসনি বাবা |আমি কী নিয়ে থাকব নরেন ?ফিরে আয় | ফিরে আয় |সন্ন্যাসীরা তাঁকে কী যেন বোঝালেন |তারপর তাঁকে তুলে দিলেন নৌকায় |জ্বলে উঠল বিবেকানন্দের চিতা |মাঝগঙ্গা থেকে তখনো ভেসে আসছে ভুবনেশ্বরীর বুকফাটা কান্না |ফিরে আয় নরেন ফিরে আয় |ভুবনেশ্বরীর নৌকো ধীরে ধীরে মিলিয়ে গেল |তাঁর কান্না‚ ফিরে আয় নরেন‚ ফিরে আয়‚ ভেসে থাকল গঙ্গার বুকে |নিবেদিতা মনে মনে ভাবলেন‚ প্রভুর ওই জ্বলন্ত বস্ত্রখণ্ডের এক টুকরো যদি পেতাম !সন্ধে ছটা |দাহকার্য সম্পন্ন হল | আর নিবেদিতা অনুভব করলেন‚ কে যেন তাঁর জামার হাতায় টান দিল | তিনি চোখ নামিয়ে দেখলেন‚ অগ্নি ও অঙ্গার থেকে অনেক দূরে‚ ঠিক যেখানে দাঁড়িয়ে তিনি‚ সেখানেই উড়ে এসে পড়ল ততটুকু জ্বলন্ত বস্ত্রখণ্ড যতটুকু তিনি প্রার্থনা করেছিলেন | নিবেদিতার মনে হল‚ মহাসমাধির ওপার থেকে উড়ে-আসা এই বহ্নিমান পবিত্র বস্ত্রখণ্ড তাঁর প্রভুর‚ তাঁর প্রাণসখার শেষ চিঠি |

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The Open Secret "5 JANUARY 1900. II লস এঞ্চেলিসে বক্তৃতা ‘দ্য ওপেন সিক্রেট

The Open Secret “5 JANUARY 1900.

“কতবার আমি অনাহারে, বিক্ষতচরণে, ক্লান্তদেহে মৃত্যুর সম্মুখীন হয়েছি। কতবার দিনের পর দিন এক মুষ্টি অন্ন না পেয়ে পথচলা অসম্ভব হয়ে পড়েছে। তখন অবসন্ন শরীর বৃক্ষছায়ায় লুটিয়ে পড়ত, তখন মনে হতো প্রাণবায়ূ বেরিয়ে যাচ্ছে। কথা বলতে পারতাম না, চিন্তাও অসম্ভব হয়ে পড়ত; আর অমনি মনে এই ভাব উঠত, ‘আমার কোন ভয় নেই, মৃত্যু ও নেই ; আমার জন্ম কখনও হয়নি, মৃত্যুও হবে না; আমার ক্ষুধা নেই, তৃষ্ণা নেই, সোহহম, সোহহম। সারা প্রকৃতির ক্ষমতা নেই যে আমায় পিষে মারে। প্রকৃতি তো আমার দাসী। হে দেবাদিদেব, হে পরমেশ্বর, নিজ মহিমা প্রকাশ কর, স্বরাজ্যে প্রতিষ্ঠিত হও! উত্তিষ্ঠিত জাগ্রত!  বিরত হয়ো না।’ অমনি আমি পুন: বল লাভ করে উঠে দাঁড়াতাম; তাই আমি আজও বেঁচে আছি।” 
লস এঞ্চেলিসে বক্তৃতা
‘দ্য ওপেন সিক্রেট
৫ জানুআরি ১৯০০।

आइये आज आपको "धरती पर भगवान हैं सिद्ध करके दिखाता हूँ"

आइये आज आपको “धरती पर भगवान हैं सिद्ध करके दिखाता हूँ” :

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आइये आज आपको “धरती पर भगवान हैं सिद्ध करके दिखाता हूँ” :


  1. “अमरनाथजी” में शिवलिंग अपने आप बनता है
  2. “माँ ज्वालामुखी” में हमेशा ज्वाला निकलती है
  3. “मैहर माता मंदिर” में रात को आल्हा अब भी आते हैं
  4. ” सीमा पर स्थित तनोट माता मंदिर में 3000 बम में से एक का ना फूटना
  5. ” इतने बड़े हादसे के बाद भी “केदारनाथ मंदिर” का बाल ना बांका होना
  6. ” पूरी दुनियां मैं आज भी सिर्फ “रामसेतु के पत्थर” पानी में तैरते हैं
  7. “रामेश्वरम धाम” में सागर का कभी उफान न मारना
  8. “पुरी के मंदिर” के ऊपर से किसी पक्षी या विमान का न निकलना
  9. “पुरी मंदिर” की पताका हमेशा हवा के विपरीत दिशा में उड़ना
  10. “. उज्जैन में “भैरोंनाथ” का मदिरा पीना
  11. ” गंगा और नर्मदा माँ (नदी) के पानी का कभी खराब न होना
  12. “श्री राम नाम धन संग्रह बॆंक में संग्रहीत इकतालीस अरब राम नाम मंत्र पूरित ग्रंथों को (कागज होने पर भी) चूहों द्वारा नहीं काटा जान। जबकि अनेक चूहे अंदर घुमते रहते हॆं।
  13. “चितोडगढ मे बाणमाताजी के मंदिर मे आरती के समय त्रिशूल का हिलना

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Dr. Liu Yiping II Drinking hot lemon water can forestall malignancy.

“Dr. Liu Yiping, energized every individual getting this bulletin to forward it to another ten individuals, positively no less than one life will be spared … I’ve done my part, I trust you can help do your part. much obliged! 

Drinking hot lemon water can forestall malignancy.

Try not to include sugar. 
Hot lemon water is more valuable than chilly lemon water. 

Both yellow n purple sweet potato has great malignancy avoidance properties. 

01. Frequently taking late night dinner can expand the shot of stomach malignant growth 

02. Never take in excess of 4 eggs for each week 

03. Eating pope’s nose (chicken rear) can cause stomach malignant growth 

04. Never eat natural products after supper. Organic products ought to be eaten before dinners 

05. Try not to take tea amid monthly cycle period. 

06. Take less soy drain, no adding sugar or egg to soy drain 

07. Try not to eat a tomato with void stomach 

08. Drink a glass of plain water each morning before sustenance to anticipate bother bladder stones 

09. No nourishment 3 hrs before sleep time 

10. Drink less Teh Tarik, no dietary properties yet can cause diabetes and hypertension 

11. Try not to eat toast bread when it is hot from stove or toaster 

12. Try not to charge your handphone or any gadget alongside you when you are dozing 

13. Drink 10 glasses of water multi-day to avoid bladder malignant growth 

14. Drink more water in the daytime, less during the evening 

15. Try not to drink in excess of some espresso daily, may cause a sleeping disorder and gastric 

16. Eat less sleek sustenance. It takes 5-7 hrs to process them, makes you feel tired 

17. After 5pm, eat less 

18. Six kinds of sustenance that fulfill you: banana, grapefruit, entire dinner bread, spinach, pumpkin, peach. 

19. Resting under 8 hrs daily may break down our cerebrum work. Taking Afternoon snoozes may keep our young look. 

Cooked tomato has preferable recuperating properties over the crude tomato. 

Hot lemon water can continue your wellbeing and make you live more! 

Hot lemon water executes disease cells 

Add boiling water to 2-3 cups of lemon. Make it an everyday drink 

The harshness in hot lemon water is the best substance to murder malignancy cells. 

Chilly lemon water just has nutrient C, no disease aversion. 

Hot lemon water can control disease tumor development. 

Clinical tests have demonstrated hot lemon water works. 

This sort of Lemon extricate treatment will just obliterate the harmful cells, it doesn’t influence solid cells. 

Next… citrus extract and lemon polyphenol inside lemon juice, can help decrease hypertension, viable avoidance of profound vein thrombosis, enhance blood course, and lessen blood clumps. 

Regardless of how bustling you are, it would be ideal if you discover an opportunity to peruse this, at that point advise others to spread the affection! 

In the wake of perusing, share with others to spread the adoration! To take great consideration of their own wellbeing!

কাশী ধামে মা গঙ্গা স্নান সেরে অসি ঘাট থেকে গেলেন অসি মাধব দর্শনে ।

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কাশী ধামে মা গঙ্গা স্নান সেরে অসি ঘাট থেকে গেলেন অসি মাধব দর্শনে

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কাশী ধামে মা গঙ্গা স্নান সেরে অসি ঘাট থেকে গেলেন অসি মাধব দর্শনে । 

অসি মাধব জগন্নাথের রূপ । বিগ্রহ দর্শনে সানন্দ- বিস্ময়ে মাতা বলিয়া উঠিলেন ,- ওমা কাশীতেও জগন্নাথ এসে বসে আছেন ! তা বেশ হয়েছে ,যিনি জগন্নাথ তিনি ই বিশ্বনাথ। মন্দির হইতে বাইরে আসিতেছেন ,এমন সময় কোথা হইতে এক সধবা নারী ছুটিয়া আসিয়া মাতা ঠাকুরানীর পায়ে পুষ্পাঞ্জলি দিলেন ।মা স্তম্ভিত হয়ে বললেন — কেন এমন করলে মা?একা মেয়ে মানুষ , তুমি এখানে এলেই বা কি করে ?নারী বিনয় বচনে বলিলেন ,- তবে শুনুন মা । ভোর রাতে স্বপ্ন দেখলুম -আমার ইষ্ট দেবী বলছেন আমায় যদি দেখতে চাস , ফুল বেলপাতা নিয়ে চলে আয় অসি ঘাটে । তুই গিয়ে প্রথম যাকে দেখবি সেই আমি। —
আমি দূর থেকে প্রথম আপনাকেই দেখতে পেয়েছি , তাই আপনার পায়ে অঞ্জলি দিলাম ,এই ফল টিও আপনি দয়া করে গ্রহন করুন মা।ঈষৎ – হাস্যে মাতা ফল টি গ্রহন করিলেন ।তাহার মাথায় হাত রাখিয়া আশীর্বাদ করিলেন ,–তোমার ইষ্ট লাভ হোক মা ।
শ্রীশ্রী দুর্গাপুরী দেবী

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