CONSECRATION OF SRI RAMAKRISHNA’S NEW TEMPLE AT BELUR MATH

BELUR MATH
BELUR MATH

Sanctification OF SRI RAMAKRISHNA’S NEW TEMPLE AT BELUR MATH 

On Friday, 14 January 1938, Swami Vijnanananda rose promptly in the first part of the day and put on another ochre material. He sat discreetly in his seat, sitting tight for the favorable minute. He said to his chaperon: “When I will introduce the Master in the new sanctuary, I will state to Swamiji: ‘Your sanctified god has now been introduced in the sanctuary you arranged, you said that you would watch from a lofty position. It would be ideal if you see now that the Master is situated in the new sanctuary.'” He said later, “At that point, I strikingly observed Swamiji, 
  1. Rakhal Maharaj, 
  2. Mahapurush Maharaj, 
  3. Sarat Maharaj, 
  4. Hari Maharaj, 
  5. Gangadhar Maharaj, 

and others remaining in the southwest corner viewing the sanctification service.”

এক ধনী পরিবারের তরুণী বধূর কথা।

পথপ্রদর্শক শ্রীশ্রীমা ( ২য় পর্ব ) 

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥

      এক ধনী পরিবারের তরুণী বধূর কথা।

      সুশীলা এবং পরমা সুন্দরী এই বধূ। শ্বশুরবাড়ীর সকলেই তাঁহার প্রতি স্নেহশীল ; কিন্তু পতির ছিল সন্দেহ-বাতিক, পত্নীকে তিনি মধ্যে মধ্যে বড়ই কটু কথা বলিতেন। এইজন্য পতিপত্নীতে সদ্ভাব ছিল না, সংসারেও শান্তি ছিল না। অবশেষে লাঞ্ছনার মাত্রা ধৈর্যের সীমা অতিক্রম করিলে বধূটি অসহিষ্ণু হইয়া পিত্রালয়ে চলিয়া গেলেন।
     পিতৃকুল বিপুল সম্পদের অধিকারী, কোনই অভাব নাই। তাঁহারা স্থির করিলেন, কন্যাকে আর লাঞ্ছনা সহিতে পতিগৃহে পাঠাইবেন না। কন্যাও অনেক মনস্তাপ পাইয়া স্থির করিয়াছেন, পতির নিকট আর ফিরিয়া যাইবেন না। এইভাবে উভয় পরিবারের মধ্যে ঘনাইয়া উঠে মনোমালিন্য এবং বিদ্বেষ। কন্যার পতি এবং শাশুড়ীর মানসিক অবস্থাও তখন এতই উত্তেজিত যে, তাঁহারা স্থির করিয়াছেন, বধূ যত ধনী পরিবারের কন্যাই হউক না কেন, তাহাকে আর গ্রহণ করিবেন না।
         কন্যার শাশুড়ী এবং পিতামহী উভয়েই মাতাঠাকুরাণীর পরিচিত। কন্যা নিজেও ছিলেন মায়ের দীক্ষিতা, মা তাঁহাকে অতিশয় স্নেহ করিতেন। তাঁহার দুঃখে মায়ের প্রাণ বিচলিত হইল, তিনি কন্যাকে ডাকিয়া পাঠাইলেন।
          কন্যা মাকে দর্শন করিতে আসিলে মা তাঁহাকে আদর করিয়া বলিলেন, — রাজার মেয়ে হ’য়েও গৌরী মহাদেবের সংসার করেন, সিদ্ধি ঘোঁটেন, স্বামীর ঘরে থাকতে তিনি আপত্তি করেন না। বাপ রাজা হ’লেও পতিই সতীর সর্বস্ব। মাগো, তুমি স্বামীর কাছে ফিরে যাও। সব দুঃখু স’য়ে পড়ে থাকো সেখানে। সৎসন্তান আসুক, মহতের বংশরক্ষে হোক, সাধুসেবা হবে। আমি প্রাণ খুলে আশীর্বাদ করছি, মা, তোমার শেষ ভাল হবে।
          গুরুর নির্দেশে কন্যা পূর্বের সঙ্কল্প ত্যাগ করিলেন, পিতৃগৃহ ত্যাগ করিয়া পুনরায় গিয়া পতিসেবায় আত্মনিয়োগ করাই তিনি স্থির করিলেন। সকলে দেখিয়া বিস্মিত হইল, মান-অভিমান বিসর্জন দিয়া ধনীর কন্যা স্বেচ্ছায় পতিগৃহে ফিরিয়া আসিয়াছেন। পতিও তাঁহাকে এইবার সাদরে গ্রহণ করিলেন। মায়ের সুপরামর্শে দুই পরিবারে শান্তি ও সম্প্রীতি পুনঃপ্রতিষ্ঠিত হইল।

Once was a launch accident II একবার একটা লঞ্চ দূর্ঘটনায় পড়লো

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একবার একটা লঞ্চ দূর্ঘটনায় পড়লো। লঞ্চের এক দম্পত্তি একটা লাইফবোট পেল। কিন্তু স্বামীটা বুঝে ফেললো সেখানে একজনের বেশি উঠতে পারবে না। লোকটা তার স্ত্রীকে আটকে রেখে নিজে লাফ দিয়ে বোটে লাফিয়ে উঠে পড়লো। ডুবন্ত লঞ্চে দাঁড়িয়ে থেকে মহিলা স্বামীর উদ্দেশ্যে একটাই মাত্র বাক্য চিৎকার করে বলেছিলো। শিক্ষক এটুকু বলে থামলেন, চারদিকে তাকিয়ে ছাত্রদের প্রতিক্রিয়া বুঝতে চাইলেন, “তোমাদের কি মনে হয়? কি বলেছিলো মহিলা!”
-“তুমি একটা ইতর, আমি কি অন্ধই না ছিলাম!” অধিকাংশ ছাত্রই এ ধরনের জবাব দিলো। শিক্ষক খেয়াল করলেন একটা ছেলে পুরোটা সময় ধরেই চুপ, তার মতামত জানতে চাইলে সে বললো, “স্যার, আমার বিশ্বাস, মহিলাটি বলেছিল, আমাদের বাচ্চাটার যত্ন নিও, ওকে দেখে রেখ।” বিস্মিত হয়ে শিক্ষক জিজ্ঞাসা করলেন, “তুমি এই গল্প আগে শুনেছ, তাই না!” ছেলেটি মাথা নেড়ে জবাব দিলো, “ আমার মাও অসুখে মারা যাওয়ার পূর্বমূহূর্তে বাবাকে একথাই
বলেছিলো।” শিক্ষক একমত হলেন, তুমিই ঠিক। লঞ্চটা ডুবে গেলো এবং বাড়ি ফিরে লোকটা একাকী মেয়েকে যত্ন করে বড় করলো। লোকটি মারা যাওয়ার বেশ কয়েক বছর পরে তাদের কন্যা বাবার একটি ডায়েরী পেল। সেখানে সে আবিষ্কার করলো, লঞ্চযাত্রায় যাওয়ার আগেই মায়ের দুরারোগ্য অসুখ ধরা পড়েছিলো, চরম মূহূর্তে তার বাবা তাই বাঁচার একমাত্র উপায়ের সদ্ব্যবহার করেছে। ডায়েরীতে তার বাবা লিখেছে, “আমারও তোমার সাথে সাগরের তলে ডুবে যেতে ইচ্ছে হচ্ছিলো, কিন্তু শুধু মেয়ের কথা ভেবে তোমাকে একাই সাগর তলে চিরদিনের জন্য ছেড়ে আসতে হলো।” গল্প শেষ হলো, ক্লাস একদম চুপ। শিক্ষক বুঝলেন, ছাত্রেরা গল্পের শিক্ষাটা ধরতে পেরেছে। ভালো এবং মন্দ, পৃথিবীর সব কিছুর পেছনেই অনেক জটিলতা আছে যা সব সময় বোঝা যায় না। আমাদের কখনোই শুধুমাত্র উপরের তল দেখেই যাচাই  করা উচিত না, অন্যকে না বুঝেই বিচার করে ফেলাটা বেশ বোকামি। যারা খাবারের বিলটা সবসময়ই নিজে দিতে চায়, তার মানে এই নয় যে তার টাকা উপচে পড়ছে, এর কারন সে টাকার চেয়ে বন্ধুত্বকে বড় করে দেখে। যারা আগে ভাগেই কাজ করে ফেলে, এর মানে সে বোকা না, আসলে তার দায়িত্বজ্ঞান রয়েছে। যারা ঝগড়া বা বাকবিতন্ডার পরে আগে মাফ চেয়ে নেয়, সেই ভুল ছিলো এমনটা নয়, বরঞ্চ সে চারপাশের মানুষকে মূল্যায়ন করে। তোমাকে যে সাহায্য করতে চায় সে তোমার কাছে কোন কিছু আশা করে না, বরং একজন প্রকৃত বন্ধু মনে করে। কেউআপনাকে প্রায়ই টেক্সট করে তার মানে এটা নয় যে তার কোন কাজ নেই, আসলে আপনাকে হৃদয় দিয়ে ভালোবাসে। একদিন আমরা একে অপর থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যাবো, কিন্তু আমাদের আচরণ ও ভালোবাসাগুলো মানুষের হৃদয়ে থেকে যাবে। কেউ না কেউ স্মরণ করবে. নতুন বছরের মূল্যায়ন এই রকমই হোক. শুভ হোক নতুন বছর সবার যারা আনন্দের আলো থেকে বঞ্চিত

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SAD news Gita Press Gorakhpur is about to close

Gita Press Gorakhpur is about to close
Gita Press Gorakhpur is about to close


SAD news   Gita Press Gorakhpur is about to close

as indicated by Zee news as Gita Press isn’t in a situation to pay even pay rates to their workers since they move all Sanatan Dharma books with no benefit. on the off chance that Gita press shuts, that will be an incredible misfortune to Hindu religion. We can’t get even a tea under 10 rs, however, you can get Hanuman Chalisa for 1 or 2 Rs. distributed by Gita Press……….! 

In the event that you are truly keen on sparing Hindu dharma, forward this to 20 individuals, to stop Gita Press getting shut!

भुवन मण्डले नवयुगमुदयतु सदा विवेकानन्दमयम् । सुविवेकमयं स्वानन्दमयम्

भुवन मण्डले नवयुगमुदयतु सदा विवेकानन्दमयम् ।
सुविवेकमयं स्वानन्दमयम्                                               ॥प॥
तमोमयं जन जीवन मधुना निष्क्रियताऽलस्य ग्रस्तम् ।
रजोमयमिदं किंवा बहुधा क्रोध लोभमोहाभिहतम् ।
भक्तिज्ञानकर्मविज्ञानैः भवतु सात्त्विकोद्योतमयम्         ॥१॥
वह्निवायुजल बल विवर्धकं पाञ्चभौतिकं विज्ञानम् ।
सलिलनिधितलं गगनमण्डलं करतलफलमिव कुर्वाणम् ।
दीक्षुविकीर्णं मनुजकुलमिदं घटयतुचैक कुटुम्बमयम्        ॥२॥
सगुणाकारं ह्यगुणाकारं एकाकारमनेकाकारम् ।
भजन्ति एते भजन्तु देवम् स्वस्वनिष्ठया विमत्सरम् ।
विश्वधर्ममिममुदारभावं प्रवर्धयतु सौहार्दमयम्                 ॥३॥
जीवे जीवे शिवस्वरूपं सदा भावयतु सेवायाम् ।
श्रीमदूर्जितं महामानवं समर्चयतु निजपूजायाम् ।
चरतु मानवोऽयं सुहितकरं धर्मं सेवात्यागमयं                   ॥४॥

Saint glory II संत महिमा

 👣।।संत महिमा।।👣
एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे।
एक किरात (शिकारी), जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था।
एक दिन किरात संत से बोला की बाबा मैं तो मृग का शिकार करता हूँ,
आप किसका शिकार करने जंगल में बैठे हैं.?
संत बोले – श्री कृष्ण का, और फूट फूट कर रोने लगे।
किरात बोला अरे, बाबा रोते क्यों हो ?
मुझे बताओ वो दिखता कैसा है ? मैं पकड़ के लाऊंगा उसको।
संत ने भगवान का वह मनोहारी स्वरुप वर्णन कर दिया….
कि वो सांवला सलोना है, मोर पंख लगाता है, बांसुरी बजाता है।
किरात बोला: बाबा जब तक आपका शिकार पकड़ नहीं लाता, पानी भी नही पियूँगा।
फिर वो एक जगह जाल बिछा कर बैठ गया…
3 दिन बीत गए प्रतीक्षा करते करते, दयालू ठाकुर को दया आ गयी, वो भला दूर कहाँ है,
बांसुरी बजाते आ गए और खुद ही जाल में फंस गए।
किरात तो उनकी भुवन मोहिनी छवि के जाल में खुद फंस गया और एक टक शयाम सुंदर को निहारते हुए अश्रु बहाने लगा,
जब कुछ चेतना हुयी तो बाबा का स्मरण आया और जोर जोर से चिल्लाने लगा शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, शिकार मिल गया,
और ठाकुरजी की ओर देख कर बोला,
अच्छा बच्चु .. 3 दिन भूखा प्यासा रखा, अब मिले हो,
और मुझ पर जादू कर रहे हो।
शयाम सुंदर उसके भोले पन पर रीझे जा रहे थे एवं मंद मंद मुस्कान लिए उसे देखे जा रहे थे।
किरात, कृष्ण को शिकार की भांति अपने कंधे पे डाल कर और संत के पास ले आया।
बाबा,
आपका शिकार लाया हुँ… बाबा ने जब ये दृश्य देखा तो क्या देखते हैं किरात के कंधे पे श्री कृष्ण हैं और जाल में से मुस्कुरा रहे हैं।
संत के तो होश उड़ गए, किरात के चरणों में गिर पड़े, फिर ठाकुर जी से कातर वाणी में बोले –
हे नाथ मैंने बचपन से अब तक इतने प्रयत्न किये, आप को अपना बनाने के लिए घर बार छोडा, इतना भजन किया आप नही मिले और इसे 3 दिन में ही मिल गए…!!
भगवान बोले – इसका तुम्हारे प्रति निश्छल प्रेम व कहे हुए वचनों पर दृढ़ विश्वास से मैं रीझ गया और मुझ से इसके समीप आये बिना रहा नहीं गया।
भगवान तो भक्तों के संतों के आधीन ही होतें हैं।
जिस पर संतों की कृपा दृष्टि हो जाय उसे तत्काल अपनी सुखद शरण प्रदान करतें हैं। किरात तो जानता भी नहीं था की भगवान कौन हैं,
पर संत को रोज़ प्रणाम करता था। संत प्रणाम और दर्शन का फल ये है कि 3 दिन में ही ठाकुर मिल गए ।
यह होता है संत की संगति का परिणाम!!
“संत मिलन को जाईये तजि ममता अभिमान,
ज्यो ज्यो पग आगे बढे कोटिन्ह यज्ञ समान”
🙏बोलो जय श्रीकृष्ण  🙏

"And then the aristocrat found herself barred in a very tower enclosed by a pungent trench with crocodiles and a large shuddery dragon guarding the door,"

“And then the aristocrat found herself barred in a very tower enclosed by a pungent trench with crocodiles and a large shuddery dragon guarding the door,”


read the mother, along with her eyes wide and voice deep.

Then, she created a tragic face and continued softly,

“So, the poor aristocrat waited and waited for her patrician to come–“

*”But, why was she anticipating the patrician, mumma?!”*
asked the insufficient woman, with impatience.

The mother side, “To return and save her, silly.”

“But, mumma, why did she want a patrician to save lots of her?” the woman asked once more.

“Uhh… hmm…” the mother was at a loss of words.

The little woman aforesaid with pride, “If it were Maine, rather than anticipating years and years for a patrician, I might have tamed the dragon and flew out of the window.”


I would have reclaimed myself.”

She discarded the book and walked away,
“This aristocrat is stupid.”

The mother unvoiced with a broad smile,
“I guess it’s time to rewrite the fairy tales.”

*_ModernFairyTales_*

* Let’s teach our daughters to be autonomous n freelance instead of anticipating a patrician or a miracle to happen!*

@page { margin: 2cm } p { margin-bottom: 0.25cm; line-height: 120% } a:link { so-language: zxx }

The world is false; You come with me Income II সংসার মিথ্যা ; তুই আমার সঙ্গে চলে আয়

গুরু  শিষ্যকে বললেন , *” সংসার মিথ্যা ; তুই আমার সঙ্গে চলে আয় | “*
শিষ্য  গুরুকে বলেছিল , *” আমার  স্ত্রী  বড় যত্ন করে ,  ওর জন্য  গুরুদেব  যেতে পারছি না | “*
শিষ্যটি হঠযোগ করত | তাই গুরু  তাকে একটি ফন্দি  শিখিয়ে  দিলেন | একদিন  তার বাড়িতে  খুব  কান্নাকাটি পড়েছে | পাড়ার লোকেরা  এসে দেখে  হঠযোগী  ঘরে  আসনে বসে  আছে —- এঁকে  বেঁকে ,আড়ষ্ট হ’য়ে | সব্বাই  বুঝতে পারলে , তার  প্রাণবায়ু  বেরিয়ে গেছে |  স্ত্রী আছড়ে  কাঁদছে ,  *” ওগো , আমাদের কি হ’ল গো —— ওগো  তুমি  আমাদের  কি ক’রে গেলে গো —- ও দিদি গো, এমন হবে তা  জানতাম না গো !”* 
এ দিকে আত্মীয়  বন্ধুরা  খাট  এনেছে , ওকে  ঘর থেকে বার করছে |
*” এখন  কি গোল হ’ল | এঁকে বেঁকে  আড়ষ্ট  হ’য়ে  থাকাতে  সে দ্বার  দিয়ে বেরুচ্ছে না | তখন একজন  প্রতিবেশী দৌড়ে  একটি কাটারি লয়ে দ্বারের চৌকাঠ  কাটতে  লাগল |
স্ত্রী  অস্থির হ’য়ে কাঁদছিল , সে  দুম্ দুম্  শব্দ শুনে  দৌড়ে  এল | এসে  কাঁদতে  কাঁদতে জিজ্ঞাসা  করলে , *ওগো  কি হ’য়েছে  গো |* তারা  বললে,  * ইনি  বেরুচ্ছেন না , তাই  চৌকাট কাটছি |*  তখন  স্ত্রী বললে, * ওগো অমন কর্ম  করো  না গো | —– আমি এখন বেওয়া হলুম |  আমার  আর  দেখবার  লোক কেউ নেই , কটি  নাবালক  ছেলেকে  মানুষ করতে হবে ! এ  দোয়ার গেলে আর তো হবে না | ওগো , ওঁর  যা  হবার  তা তো হয়ে গেছে —– হাত পা ওঁর কেটে  দাও ! “* তখন হঠযোগী  দাঁড়িয়ে পড়ল | তার  তখন ঔষধের ঝোঁক চলে গেছে | দাঁড়িয়ে বলছে , *”তবে  রে  শালী , আমার  হাত পা  কাটবে |”* এই  বলে বাড়ি   ত্যাগ ক’রে  গুরুর  সঙ্গে চলে গেল |
অনেকে ঢং করে শোক করে | কাঁদতে হবে জেনে  আগে  নথ্  খোলে আর  গহনা সব  খোলে ; খুলে  বাক্সের  ভিতর চাবি দিয়ে রেখে দেয় |  তারপর  আছড়ে এসে পড়ে , আর কাঁদে , ওগো , দিদিগো ,  আমার কি হ’ল
গো !”* ||
|| শ্রীরামকৃষ্ণ ||

খণ্ডন ভব-বন্ধন জগ-বন্দন বন্দি তোমায়।

–কেউ কখনো সন্ধ্যায় বেলুড় মঠে গেলে দূর থেকে শুনতে পাবেন—শ্রবণ-সুখকর একটি সঙ্গীতধ্বনি ভেসে আসছে।’ 

খণ্ডন ভব-বন্ধন জগ-বন্দন বন্দি তোমায়।’ রোজই সন্ধ্যারতির সময় বেলুড় মঠে, রামকৃষ্ণ সংঘের সব শাখা কেন্দ্রে ও শ্রীরামকৃষ্ণ ভক্ত-সংঘ গুলিতে, সর্বত্র সন্ধ্যা সমাগমে এই গীত পরিবেশিত হয়।স্বামী বিবেকানন্দ নিজেই ধ্যানবুত্থিত চিত্তে এই স্তবটি রচনা ও সুরারোপ করেছেন। এই অনবদ্য আরাত্রিক ভজনটির একটি সুন্দর ইতিহাস আছে।—– স্বনামধন্য নাট্যকার গিরিশচন্দ্র ঘোষ স্বামীজিকে বারংবার অনুরোধ করেছিলেন শ্রীরামকৃষ্ণের একটি প্রামাণ্য জীবনীগ্রন্থ লেখার জন্য। কিন্তু স্বামীজির ওপর ঠাকুর তো অন্য দায়ভার চাপিয়েছিলেন।স্বামীজি অবশ্য গিরিশের অনুরোধ এড়িয়ে যাওয়ার জন্য অন্য যুক্তি দেখিয়েছিলেন।বলেছিলেন–” তিনি(শ্রীরামকৃষ্ণ) এত মহান ছিলেন, এত বড় ছিলেন যে আমি তাঁকে কিছুই বুঝতে পারিনি।…. শেষে শিব গড়তে বানর গড়ে ফেলব? তা আমি পারব না।” বাক্যমনাতীত-কে শব্দের মধ্যে কি বাঁধা যায়? কিন্তু আক্ষরিক অর্থে স্বামীজি শ্রীরামকৃষ্ণের জীবনী রচনা না করলেও সূত্রাকারে সেই অসীমকে সীমার মধ্যে বেঁধে ফেললেন যে!তত্ত্ব-সম্পৃক্ত স্তবগানের সুরের তরঙ্গে অনন্তকে করলেন ব্যক্ত মানবীয় ভাষায়। এ যেন ‘জগতে আনন্দ-যজ্ঞে’ স্বামীজির দিব্যাহুতি।——— আলমবাজার থেকে মঠ যখন উঠে এল বেলুড় নীলাম্বর মুখার্জীর বাগানবাড়িতে তখন সন্ধ্যারতির সময় মৃদঙ্গ-সহ শিবস্তুতি গীত হতো———— “ভজ শিব ওঙ্কার, জয় শিব ওঙ্কার~~    নাথ ভোলে মহাশম্ভো, হর হর মহাদেব।~~~~~ ব্রহ্মা বিষ্ণু সদাশিব,হর হর মহাদেব।।”——— কিছুদিন পর স্বামীজি রচনা করলেন মাত্র প্রথম দুটি পঙতি—“খণ্ডন ভব-বন্ধন জগ-বন্দন বন্দি তোমায়। নিরঞ্জন নররূপধর নির্গুণ গুণময়।।”  ——এবং শেষাংশ–   নমো নমো প্রভু বাক্যমনাতীত মনোবচনৈকাধার। জ্যোতির জ্যোতি উজল হৃদিকন্দর, তুমি তমোভঞ্জনহার।।~~ধে ধে ধে লঙ্গ রঙ্গ ভঙ্গ বাজে অঙ্গ সঙ্গ মৃদঙ্গ। ~~গাইছে ছন্দ ভকতবৃন্দ আরতি তোমার।~~জয় জয় আরতি তোমার/হর হর আরতি তোমার/শিব শিব আরতি তোমার।। সেটি ছিল ১৮৯৮ খ্রীষ্টাব্দ। কিন্তু শশী মহারাজ  অর্থাৎ স্বামী রামকৃষ্ণানন্দজী দীর্ঘক্ষণব্যাপী দৃপ্তভঙ্গীতে নৃত্যসহ আরতি করতেন।এই সংক্ষিপ্ত  ভজনটি পর্যাপ্ত বোধ না হওয়ায় স্বামীজি প্রথম শ্লোকের সঙ্গে আরও সাতটি শ্লোক জুড়ে একটি অষ্টপদী রচনা করলেন। একদিন শ্রীরামকৃষ্ণের জন্মতিথিপূজা উৎসবে স্বামীজী স্বয়ং মৃদঙ্গ বাজিয়ে এই আরাত্রিক ভজন গাইলেন। ~~~~~~~~~ আজ স্বামীজির জন্মদিন। এই শুভদিনটিতে আমরা সেই দৃশ্যটির ধ্যান করার চেষ্টা করি,— স্বামীজি মৃদঙ্গ বাজিয়ে গাইছেন—-খণ্ডণ ভব-বন্ধন জগ-বন্দন বন্দি তোমায়………..। আর শশী মহারাজ অপূর্ব নৃত্যের সঙ্গে প্রভু শ্রীরামকৃষ্ণের আরতি করছেন।——- জয় শ্রীরামকৃষ্ণ।জয় শ্রীশ্রী মা সারদাদেবী। জয় স্বামী বিবেকানন্দ।জয় শ্রীরামকৃষ্ণের সকল পার্ষদবৃন্দ।।    ——(সংগৃহীত)।।—-

किरात बोला अरे, बाबा रोते क्यों हो ? मुझे बताओ वो दिखता कैसा है ? मैं पकड़ के लाऊंगा उसको।

 👣।।संत महिमा।।👣

एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे।
एक किरात (शिकारी), जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था।
एक दिन किरात संत से बोला की बाबा मैं तो मृग का शिकार करता हूँ,
आप किसका शिकार करने जंगल में बैठे हैं.?
संत बोले – श्री कृष्ण का, और फूट फूट कर रोने लगे।
किरात बोला अरे, बाबा रोते क्यों हो ?
मुझे बताओ वो दिखता कैसा है ? मैं पकड़ के लाऊंगा उसको।
संत ने भगवान का वह मनोहारी स्वरुप वर्णन कर दिया….
कि वो सांवला सलोना है, मोर पंख लगाता है, बांसुरी बजाता है।
किरात बोला: बाबा जब तक आपका शिकार पकड़ नहीं लाता, पानी भी नही पियूँगा।
फिर वो एक जगह जाल बिछा कर बैठ गया…
3 दिन बीत गए प्रतीक्षा करते करते, दयालू ठाकुर को दया आ गयी, वो भला दूर कहाँ है,
बांसुरी बजाते आ गए और खुद ही जाल में फंस गए।
किरात तो उनकी भुवन मोहिनी छवि के जाल में खुद फंस गया और एक टक शयाम सुंदर को निहारते हुए अश्रु बहाने लगा,
जब कुछ चेतना हुयी तो बाबा का स्मरण आया और जोर जोर से चिल्लाने लगा शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, शिकार मिल गया,
और ठाकुरजी की ओर देख कर बोला,
अच्छा बच्चु .. 3 दिन भूखा प्यासा रखा, अब मिले हो,
और मुझ पर जादू कर रहे हो।
शयाम सुंदर उसके भोले पन पर रीझे जा रहे थे एवं मंद मंद मुस्कान लिए उसे देखे जा रहे थे।
किरात, कृष्ण को शिकार की भांति अपने कंधे पे डाल कर और संत के पास ले आया।
बाबा, आपका शिकार लाया हुँ… बाबा ने जब ये दृश्य देखा तो क्या देखते हैं किरात के कंधे पे श्री कृष्ण हैं और जाल में से मुस्कुरा रहे हैं।
संत के तो होश उड़ गए, किरात के चरणों में गिर पड़े, फिर ठाकुर जी से कातर वाणी में बोले –
हे नाथ मैंने बचपन से अब तक इतने प्रयत्न किये, आप को अपना बनाने के लिए घर बार छोडा, इतना भजन किया आप नही मिले और इसे 3 दिन में ही मिल गए…!!
भगवान बोले – इसका तुम्हारे प्रति निश्छल प्रेम व कहे हुए वचनों पर दृढ़ विश्वास से मैं रीझ गया और मुझ से इसके समीप आये बिना रहा नहीं गया।
भगवान तो भक्तों के संतों के आधीन ही होतें हैं।
जिस पर संतों की कृपा दृष्टि हो जाय उसे तत्काल अपनी सुखद शरण प्रदान करतें हैं। किरात तो जानता भी नहीं था की भगवान कौन हैं,
पर संत को रोज़ प्रणाम करता था। संत प्रणाम और दर्शन का फल ये है कि 3 दिन में ही ठाकुर मिल गए ।
यह होता है संत की संगति का परिणाम!!
“संत मिलन को जाईये तजि ममता अभिमान,
ज्यो ज्यो पग आगे बढे कोटिन्ह यज्ञ समान”
🙏बोलो जय श्रीकृष्ण  🙏
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